由特别检察官穆勒主导的历时一年的“通俄门”调查结束,没有发现特朗普本人及其团队的通俄证据。这对特朗普来说,不能不说是自他当选总统后迄今为止得到的一个最大礼包。之前,特朗普深陷“通俄门”漩涡,其内政外交直接或间接受制于该事件。民主共和两党陷入恶斗,美国国内政治分裂,很大程度上也是围绕特朗普“通俄门”进行的。现在,穆勒的调查还他一个“清白”,少了这个“包袱”,扫除了其总统连任的最大障碍。
那么,对正处于贸易谈判的中国来说,这是好事还是坏事?已经卸除通俄嫌疑的特朗普,会不会再出重拳对付中国?
中国国内一种看法认为,没有了“通俄门”的后顾之忧,特朗普将毫无顾忌地和普京走近,美俄两国关系缓和,莫斯科也就没有必要借助北京对抗华盛顿。俄中关系必定会比现在疏远。这样,特朗普就好腾出手来对付中国,而不必担心俄罗斯从旁使坏,甚至可以联手莫斯科一同对付北京。
同时,“通俄门”调查结论有利特朗普,也减少了民主党的牵扯,之前,他要花大量时间和精力用来和国会民主党人的内斗,这使得他不能专心致志去关注外交政策和对外事务。比如,在二月底的特金会上,特朗普把未和金正恩签订协议部分归咎于民主党人在国会大搞黑材料,让他生气。现在这些麻烦都消除,特朗普就可以一门心思对付中国,除了贸易谈判外,华盛顿会在其他一系列中国在乎的事情上,向北京发难。
这个看法很难说对或错。本来,特朗普上台之初,就有“联俄制中”的想法,据说出自基辛格的献策,虽然后来基辛格出面否认,但想必该想法不是空穴来风,这从特朗普本人从不掩饰他对普京和俄罗斯的好感可略知一二。特朗普当选之初给蔡英文的“电话外交”也说明了这点。如果没有“联俄制中”想法,特朗普不大可能一开始就冒失拿台湾向中国开刀。只是后来由于 “通俄门”事件爆发,民主党人揪住不放,使得特朗普不得不去应付民主党,并为表示自己的“政治正确”,转而对普京和莫斯科采取强硬态度,作为天平的两端,对习近平和北京却开始“惺惺相惜”起来,直到贸易战才改变对中国态度。
从普京来说,如果特朗普伸出橄榄枝,他当然巴不得。最近几年由于美国的制裁,俄罗斯的经济难有起色,这对普京的形象多少有些损害。而改善和美国的关系,也能减少对北京的依赖,并在美中两国的"斗殴"中左右逢源,获取好处,反而使得北京要更多看莫斯科的眼色行事。故美俄走近,在美中俄大三角关系中,北京是相对处于被动的一方。
然而,这只是事情的一个方面或一种可能,事情还有另一方面或另一可能,而且后者的实现程度也不低。这就是如果贸易谈判达成,特朗普对中国的态度反而可能比现在要好,美国的对华政策反而可能不如现在这般咄咄逼人。
为什么这样讲?在分析特朗普的对外政策时,如果说“通俄门”是一个掣肘因素,那么一旦这个因素消失,由此所引发的美国国内压力施加特朗普的外交政策的影响就会减少,他可以不必为显示自己的“政治正确”而特意制定强硬的对外政策。换言之,特朗普现在对中国的强硬态度,会不会因为“通俄门”事件的影响,而要急于在对华政策上表现出这种强硬,以向民主党人和美国民众证明自己是站在美国的立场和利益上的,以弥补“通俄门”给他带来的道德短板。此种可能性应该存在。果有如此考虑,如今“通俄门”警报已排除,特朗普就没有必要在对华政策上再表演这种"政治正确",因而,一旦美中贸易谈判达成协议,为"褒奖"习近平,特朗普反而有可能在现有严厉的立场上后退一步。
另一方面,在对俄关系上,特朗普固然少了“通俄门”羁绊,但他能否由此“毫无顾忌地”亲近普京,是要打问号的,或者,其实是不可能的。无论对华还是对俄,既要看到总统个人的作用,也要看到美国建制派在其中所起作用,总统并不能独揽外交政策。具体到对俄政策的制定和实施,实际是美国建制派在主导。后者对俄罗斯的敌意不亚于对华。比如,兰德公司今年2月发布的一份报告就称俄罗斯是流氓,中国是竞争对手,俄对美国安全的威胁比中国更直接、更严重。这反映了美国建制派长期以来对俄的看法。
还应看到,“通俄门”事件虽已解套,但美国两党以及民主党和特朗普的矛盾并未减少,美国政治的极化现象依然存在,在对俄事务上他依然要受民主党的制约。而民主党对穆勒的“通俄门”调查很不满,众议院民主党占主导的六大委员会已经向司法部发函,要后者在4月2日前将调查报告的副本和所有证据都上交。显然,民主党不甘心就这样轻易放过特朗普,必然还会就此事及其他议题继续纠缠。在这种情况下,难以想象特朗普会在对俄关系上步子迈得太快。
此外,特朗普要“联俄制中”,也要得到普京的响应,一个巴掌是拍不响的。在俄美及俄中关系上要搞清楚,普京是基于短期抗美需求和中国接成准盟友关系,还是俄中关系有稳定的长期基础。答案是,两者都有。前者使得特朗普递来橄榄枝时普京不会不接受,但是普京也一定明白美国建制派对俄罗斯的真实态度,因此不会也不可能全盘倒向美国,和美联手对中。因为他知道,一旦中国被打趴下,下一个就轮到俄了。俄中虽然也互相戒备,但令俄罗斯人最担忧的领土问题随着江时期两国边界的勘测完成,不大可能在今后成为两国关系的主要障碍。而中国的资金和市场也是俄罗斯需要的。因此,目前俄中关系的基础不会因美国的介入动摇,俄罗斯不会参与美国对中国的战略围堵。
事实上,鉴于美国已经确立中国为战略对手,特朗普是否在“通俄门”调查结束后调整对华政策,是进一步展示强硬还是怀柔一点,不是很重要,因为战略对手的定位锁定了美国长期对华政策的基调,即使有修补,也是在上下一定幅度内,不会有一个大幅度的摆动。故对中国来说,没有必要为特朗普的下一步怎么走过度担忧,如果特朗普的对华政策有大改变,也一定不是因"通俄门"结束调查,而会是其他因素。
Friday, March 29, 2019
Monday, March 25, 2019
Javed Akhtar फ़िल्म 'पीएम नरेंद्र मोदी 'का पोस्टर देखकर हैरान हुए
बॉलीवुड के जाने-माने गीतकार जावेद अख़्तर ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने विवेक ओबरॉय अभिनीत फ़िल्म पीएम नरेंद्र मोदी के लिए कोई गाना नहीं लिखा है और फ़िल्म के ट्रेलर की क्रेडिट लाइन में अपना नाम देखकर वो हैरान हैं.
ये फ़िल्म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन पर आधारित बताई जा रही है. हाल ही में होली के मौके पर इस फ़िल्म का ट्रेलर जारी किया गया था.
जावेद अख़्तर ने ट्वीट कर अपनी हैरानी जाहिर की है. फिल्म के पोस्टर में जावेद अख़्तर का नाम भी लिखा गया है, जबकि जावेद अख्तर का कहना है कि उन्होंने इस फिल्म में कोई योगदान नहीं दिया है.
जावेद अख़्तर ने फ़िल्म का पोस्टर शेयर कर ट्वीट किया, "मैं फ़िल्म के पोस्टर पर अपना नाम देखकर हैरान हूं. मैंने फ़िल्म के लिए कोई भी गाना नहीं लिखा है."
इस फ़िल्म की क्रेडिट लाइन में गीतकार के तौर पर जावेद अख्तर के अलावा, प्रसून जोशी, समीर, अभेंद्र कुमार उपाध्याय, सरदारा, पैरी जी और लवराज का नाम है.
जावेद अख़्तर की पत्नी और मशहूर अदाकारा शबाना आज़मी ने जावेद अख्तर के ट्वीट को रीट्वीट किया है.
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता उमंग कुमार के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में विवेक ओबरॉय मुख्य भूमिका में हैं. फ़िल्म में बोमन ईरानी, मनोज जोशी, ज़रीना वहाब और प्रशांत नारायण भी भूमिका निभा रहे हैं.
लोकसभा चुनाव 2019 के पहले चरण की वोटिंग 11 अप्रैल को होनी है, लेकिन इससे पहले ही 'पीएम नरेंद्र मोदी' को रिलीज़ किया जाएगा. पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रिलीज की तारीख़ 12 अप्रैल बताई जा रही थी, लेकिन बाद में इसे 5 अप्रैल कर दिया गया.
क्या कह रहे हैं यूज़र?
जावेद अख़्तर के ट्वीट के बाद Javed Akhtar ट्विटर के टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गया.
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ट्वीट किया, "एक सी ग्रेड की इलेक्शन प्रौपेगेंडा फ़िल्म के गीत जावेद अख़्तर जैसे जाने-माने गीतकार के लिखने का दावा मानहानि है. ये भक्तों की हताशा दिखाता है."
हैंडल से ट्वीट किया गया, "क्या आप बॉलीवुड या भारत में इकलौते जावेद अख़्तर हैं? उन पर सीधे आरोप मत लगाइए, पहले उन्हें सफाई तो देने दीजिए."
ये फ़िल्म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन पर आधारित बताई जा रही है. हाल ही में होली के मौके पर इस फ़िल्म का ट्रेलर जारी किया गया था.
जावेद अख़्तर ने ट्वीट कर अपनी हैरानी जाहिर की है. फिल्म के पोस्टर में जावेद अख़्तर का नाम भी लिखा गया है, जबकि जावेद अख्तर का कहना है कि उन्होंने इस फिल्म में कोई योगदान नहीं दिया है.
जावेद अख़्तर ने फ़िल्म का पोस्टर शेयर कर ट्वीट किया, "मैं फ़िल्म के पोस्टर पर अपना नाम देखकर हैरान हूं. मैंने फ़िल्म के लिए कोई भी गाना नहीं लिखा है."
इस फ़िल्म की क्रेडिट लाइन में गीतकार के तौर पर जावेद अख्तर के अलावा, प्रसून जोशी, समीर, अभेंद्र कुमार उपाध्याय, सरदारा, पैरी जी और लवराज का नाम है.
जावेद अख़्तर की पत्नी और मशहूर अदाकारा शबाना आज़मी ने जावेद अख्तर के ट्वीट को रीट्वीट किया है.
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता उमंग कुमार के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में विवेक ओबरॉय मुख्य भूमिका में हैं. फ़िल्म में बोमन ईरानी, मनोज जोशी, ज़रीना वहाब और प्रशांत नारायण भी भूमिका निभा रहे हैं.
लोकसभा चुनाव 2019 के पहले चरण की वोटिंग 11 अप्रैल को होनी है, लेकिन इससे पहले ही 'पीएम नरेंद्र मोदी' को रिलीज़ किया जाएगा. पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रिलीज की तारीख़ 12 अप्रैल बताई जा रही थी, लेकिन बाद में इसे 5 अप्रैल कर दिया गया.
क्या कह रहे हैं यूज़र?
जावेद अख़्तर के ट्वीट के बाद Javed Akhtar ट्विटर के टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गया.
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ट्वीट किया, "एक सी ग्रेड की इलेक्शन प्रौपेगेंडा फ़िल्म के गीत जावेद अख़्तर जैसे जाने-माने गीतकार के लिखने का दावा मानहानि है. ये भक्तों की हताशा दिखाता है."
हैंडल से ट्वीट किया गया, "क्या आप बॉलीवुड या भारत में इकलौते जावेद अख़्तर हैं? उन पर सीधे आरोप मत लगाइए, पहले उन्हें सफाई तो देने दीजिए."
Monday, March 18, 2019
#ManoharParrikar- IIT इंजीनियर, CM से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक्स तक
गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का 63 वर्ष की आयु में रविवार को निधन हो गया. पर्रिकर पिछले एक साल से अग्नाशय के कैंसर से पीड़ित थे. उनका इलाज अमरीका के साथ-साथ नई दिल्ली स्थित एम्स और मुंबई के एक निजी अस्पताल में चल रहा था.
मनोहर पर्रिकर के निधन से गोवा के सामाजिक राजनीतिक हालात में बहुत बड़ा असर होगा. वो आईआईटी से पास पहले इंजीनियर थे, जो किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री बने. साथ में गोवा में प्रशासनिक कार्यों पर उनकी छाप अमिट रहेगी.
वो भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी के ऐसे पहले राजनेता होंगे जिन्होंने ख़ुद को 'सॉफ्ट हिंदुत्व' के आइकन के रूप में आगे रखते हुए सभी समुदायों को शांति का संदेश दिया वो भी ऐसे माहौल में जब उनकी पार्टी देश के दूसरे हिस्सों में हिंदुत्व पर आक्रामक रूप अपनाए हुई थी.
उन्होंने राज्य में धर्मनिरपेक्षता, उदार प्रकृति और अपनी विचारधारा से अधिक इस क्षेत्र के लिए पुनर्निर्माण की राजनीति की, जो संभवत उनके लिए आवश्यक थी. अगर मनोहर पर्रिकर गोवा की बजाय उत्तर प्रदेश में राजनीति करते तो क्या वो वैसे ही उदारवादी राजनेता बन पाते? इस सवाल का जवाब हम नहीं जानते.
सत्ता हर किसी को बदलती है और पर्रिकर भी इससे अछूते नहीं रहे. जब उन्हें गोवा में राजनीतिक गलियारों में सेंध लगाने और अपनी पार्टी की मदद से सरकार गिराने का मौका मिला तो उन्होंने खुद को एक ऐसे महत्वाकांक्षी, लेकिन ईमानदार शख्स के रूप में पेश किया जो राज्य की राजनीति को भ्रष्टाचार और अस्थिरता से मुक्त करने के मिशन में लगा है.
उन्होंने ऐसे वक्त में जब लोगों का राजनीति पर से भरोसा उठता जा रहा था, अपनी व्यक्तिगत हैसियत से आदर्श पेश कर लोगों में भरोसा जगाया. सजग और पढ़े-लिखे मध्य वर्ग ने उन पर दांव लगाया और एक तरह से पर्रिकर उनके नायक बन गए.
पर्रिकर गोवा में बीजेपी के निर्विवाद नेता थे, पार्टी में ऐसा कोई नहीं था, जो उन्हें चुनौती देता. वो बीजेपी के उन चार विधायकों में शामिल थे, जो सबसे पहले बीजेपी के टिकट पर गोवा विधानसभा के लिए चुने गए थे.
मध्यमार्गी छवि
बीजेपी में जितनी कट्टरपंथी आवाज़ें थी उन्हें पर्रिकर ने गोवा की सीमाओं से परे ही रखा. उनकी खुद की छवि धुर दक्षिणपंथी के बजाय मध्यमार्गी राजनेता की रही. पर्रिकर अक्सर कहा करते थे - "ये गोवा बीजेपी है, यहाँ चीज़ें अलग तरह से होती हैं."
फिर भी वे साल 2014 के चुनावी अभियान में बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत का नाम ज़ोर-शोर से उठाने वाले लोगों में प्रमुख थे. गोवा में बीजेपी की नेशनल एक्ज़िक्यूटिव में मनोहर पर्रिकर ने नरेंद्र मोदी के नाम का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के सबसे बेहतर विकल्प हैं.
इसके अगले दिन गोवा मैरियट होटल की लॉबी में जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा, कुछ कहे जाने की ज़रूरत थी और इसके लिए माकूल वक्त यही था.
नरेंद्र मोदी का नाम बढ़ाने वाली बात का हवाला देते हुए पर्रिकर ने ये कहा था.
राजनीति की इंजीनियरिंग के वे ऐसे बाज़ीगर थे जो धुर विरोधियों को भी एक पाले में लाकर खड़ा कर देने का माद्दा रखते थे. मुख्यमंत्री के तौर पर पहले कार्यकाल में उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की थी लेकिन वे इसमें बुरी तरह से नाकाम रहे.
विपक्ष में पांच साल बिताने के बाद, बीजेपी ने 2012 में गोवा विधानसभा में बहुमत हासिल किया. नतीजे आने के दूसरे दिन सुबह मैं उनसे मिलने गया. वो उस वक्त पणजी के मंडोवी होटल के एक कमरे में आराम कर रहे थे.
टेबल पर चॉकलेट केक था. उन्होंने मुझे केक का एक टुकड़ा दिया और फिर हमारी बातचीत शुरू हुई.
मैंने उन्हें बधाई देते हुए कहा, "आपने इसके लिए सात साल का इंतज़ार किया."
उन्होंने कहा, "शुरू-शुरू में मैं बेहद बेचैन था. मुझे कांग्रेस सरकार को उखाड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी. बाद में मैंने महसूस किया कि समूचा राज्य एक तरह के प्रेशर कुकर में बदल रहा था. मैंने इस दबाव से प्रेशर कुकर के फटने तक का इंतजार किया और फिर मैंने विधानसभा के भीतर और बाहर अपनी कोशिशें शुरू कीं."
उसी रात मुझे एक दिग्गज कांग्रेस नेता का फ़ोन आया. उन्होंने मुझसे कहा, "अगर वो जनता से किए अपने आधे वादे भी पूरे कर देते हैं तो उन्हें अगले 15 साल के लिए मुख्यमंत्री के पद से हटाना मुश्किल होगा."
सत्ता में आने के अगले पांच साल ये देखने वाले थे कि किस तरह एक बड़ा अभियान खड़ा कर सत्ता हासिल की गई और फिर इसकी धज्जियां उड़ा दी गईं. उनके लोकलुभावन वादों ने राज्य को तिगुने क़र्ज़ के बोझ से लाद दिया.
अपने उन सभी वादों पर वो बुरी तरह से विफल रहे जिसके लिए उन्हें जनादेश मिला था.
हालांकि जल्द ही उन्हें इससे छुटकारा भी मिल गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनका पीएम प्रत्याशी के तौर पर पर्रिकर ने अनुमोदन किया था, ने उन्हें रक्षा मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया.
मोदी ने उन्हें भरोसेमंद सिपहसालार के रूप में दिल्ली बुलाया. लेकिन पर्रिकर दिल्ली में हमेशा अलग-थलग महसूस करते थे. उनको पदोन्नति के रूप में देश का रक्षा मंत्री बनने में दिलचस्पी नहीं थी और जैसे ही उन्हें पहला मौका मिला वो मुख्यमंत्री के रूप में वापस गोवा आ गए.
हालांकि, शुरुआत में रक्षा मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की सराहना की गई लेकिन उनके उसी कार्यकाल के दौरान ही रफ़ाल डील भी की गई थी. उड़ी सर्जिकल स्ट्राइक से मिले यश के बावजूद वो देश की राजधानी में कभी खुद को व्यवस्थित नहीं कर सके.
क्या यह दिल्ली की राजनीति की निर्मम प्रकृति थी या कि अपने मंत्रालय की कमान को पूरी तरह संभालने में उनकी नाकामी? उन्होंने गोवा वापसी को वरीयता दी.
कांग्रेस ने उन पर हमला करना शुरू किया, दावे किए गए कि रफ़ाल की फाइलें उनके बेडरूम में थीं. उन्होंने आरोपों से इनकार किया.
हालांकि रफ़ाल से जुड़े किसी भी ग़लत काम में पर्रिकर की संलिप्तता कभी साबित नहीं हुई है, लेकिन यह मामला उनके निधन के बाद भी जारी रहेगा.
मनोहर पर्रिकर के निधन से गोवा के सामाजिक राजनीतिक हालात में बहुत बड़ा असर होगा. वो आईआईटी से पास पहले इंजीनियर थे, जो किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री बने. साथ में गोवा में प्रशासनिक कार्यों पर उनकी छाप अमिट रहेगी.
वो भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी के ऐसे पहले राजनेता होंगे जिन्होंने ख़ुद को 'सॉफ्ट हिंदुत्व' के आइकन के रूप में आगे रखते हुए सभी समुदायों को शांति का संदेश दिया वो भी ऐसे माहौल में जब उनकी पार्टी देश के दूसरे हिस्सों में हिंदुत्व पर आक्रामक रूप अपनाए हुई थी.
उन्होंने राज्य में धर्मनिरपेक्षता, उदार प्रकृति और अपनी विचारधारा से अधिक इस क्षेत्र के लिए पुनर्निर्माण की राजनीति की, जो संभवत उनके लिए आवश्यक थी. अगर मनोहर पर्रिकर गोवा की बजाय उत्तर प्रदेश में राजनीति करते तो क्या वो वैसे ही उदारवादी राजनेता बन पाते? इस सवाल का जवाब हम नहीं जानते.
सत्ता हर किसी को बदलती है और पर्रिकर भी इससे अछूते नहीं रहे. जब उन्हें गोवा में राजनीतिक गलियारों में सेंध लगाने और अपनी पार्टी की मदद से सरकार गिराने का मौका मिला तो उन्होंने खुद को एक ऐसे महत्वाकांक्षी, लेकिन ईमानदार शख्स के रूप में पेश किया जो राज्य की राजनीति को भ्रष्टाचार और अस्थिरता से मुक्त करने के मिशन में लगा है.
उन्होंने ऐसे वक्त में जब लोगों का राजनीति पर से भरोसा उठता जा रहा था, अपनी व्यक्तिगत हैसियत से आदर्श पेश कर लोगों में भरोसा जगाया. सजग और पढ़े-लिखे मध्य वर्ग ने उन पर दांव लगाया और एक तरह से पर्रिकर उनके नायक बन गए.
पर्रिकर गोवा में बीजेपी के निर्विवाद नेता थे, पार्टी में ऐसा कोई नहीं था, जो उन्हें चुनौती देता. वो बीजेपी के उन चार विधायकों में शामिल थे, जो सबसे पहले बीजेपी के टिकट पर गोवा विधानसभा के लिए चुने गए थे.
मध्यमार्गी छवि
बीजेपी में जितनी कट्टरपंथी आवाज़ें थी उन्हें पर्रिकर ने गोवा की सीमाओं से परे ही रखा. उनकी खुद की छवि धुर दक्षिणपंथी के बजाय मध्यमार्गी राजनेता की रही. पर्रिकर अक्सर कहा करते थे - "ये गोवा बीजेपी है, यहाँ चीज़ें अलग तरह से होती हैं."
फिर भी वे साल 2014 के चुनावी अभियान में बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत का नाम ज़ोर-शोर से उठाने वाले लोगों में प्रमुख थे. गोवा में बीजेपी की नेशनल एक्ज़िक्यूटिव में मनोहर पर्रिकर ने नरेंद्र मोदी के नाम का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के सबसे बेहतर विकल्प हैं.
इसके अगले दिन गोवा मैरियट होटल की लॉबी में जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा, कुछ कहे जाने की ज़रूरत थी और इसके लिए माकूल वक्त यही था.
नरेंद्र मोदी का नाम बढ़ाने वाली बात का हवाला देते हुए पर्रिकर ने ये कहा था.
राजनीति की इंजीनियरिंग के वे ऐसे बाज़ीगर थे जो धुर विरोधियों को भी एक पाले में लाकर खड़ा कर देने का माद्दा रखते थे. मुख्यमंत्री के तौर पर पहले कार्यकाल में उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की थी लेकिन वे इसमें बुरी तरह से नाकाम रहे.
विपक्ष में पांच साल बिताने के बाद, बीजेपी ने 2012 में गोवा विधानसभा में बहुमत हासिल किया. नतीजे आने के दूसरे दिन सुबह मैं उनसे मिलने गया. वो उस वक्त पणजी के मंडोवी होटल के एक कमरे में आराम कर रहे थे.
टेबल पर चॉकलेट केक था. उन्होंने मुझे केक का एक टुकड़ा दिया और फिर हमारी बातचीत शुरू हुई.
मैंने उन्हें बधाई देते हुए कहा, "आपने इसके लिए सात साल का इंतज़ार किया."
उन्होंने कहा, "शुरू-शुरू में मैं बेहद बेचैन था. मुझे कांग्रेस सरकार को उखाड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी. बाद में मैंने महसूस किया कि समूचा राज्य एक तरह के प्रेशर कुकर में बदल रहा था. मैंने इस दबाव से प्रेशर कुकर के फटने तक का इंतजार किया और फिर मैंने विधानसभा के भीतर और बाहर अपनी कोशिशें शुरू कीं."
उसी रात मुझे एक दिग्गज कांग्रेस नेता का फ़ोन आया. उन्होंने मुझसे कहा, "अगर वो जनता से किए अपने आधे वादे भी पूरे कर देते हैं तो उन्हें अगले 15 साल के लिए मुख्यमंत्री के पद से हटाना मुश्किल होगा."
सत्ता में आने के अगले पांच साल ये देखने वाले थे कि किस तरह एक बड़ा अभियान खड़ा कर सत्ता हासिल की गई और फिर इसकी धज्जियां उड़ा दी गईं. उनके लोकलुभावन वादों ने राज्य को तिगुने क़र्ज़ के बोझ से लाद दिया.
अपने उन सभी वादों पर वो बुरी तरह से विफल रहे जिसके लिए उन्हें जनादेश मिला था.
हालांकि जल्द ही उन्हें इससे छुटकारा भी मिल गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनका पीएम प्रत्याशी के तौर पर पर्रिकर ने अनुमोदन किया था, ने उन्हें रक्षा मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया.
मोदी ने उन्हें भरोसेमंद सिपहसालार के रूप में दिल्ली बुलाया. लेकिन पर्रिकर दिल्ली में हमेशा अलग-थलग महसूस करते थे. उनको पदोन्नति के रूप में देश का रक्षा मंत्री बनने में दिलचस्पी नहीं थी और जैसे ही उन्हें पहला मौका मिला वो मुख्यमंत्री के रूप में वापस गोवा आ गए.
हालांकि, शुरुआत में रक्षा मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की सराहना की गई लेकिन उनके उसी कार्यकाल के दौरान ही रफ़ाल डील भी की गई थी. उड़ी सर्जिकल स्ट्राइक से मिले यश के बावजूद वो देश की राजधानी में कभी खुद को व्यवस्थित नहीं कर सके.
क्या यह दिल्ली की राजनीति की निर्मम प्रकृति थी या कि अपने मंत्रालय की कमान को पूरी तरह संभालने में उनकी नाकामी? उन्होंने गोवा वापसी को वरीयता दी.
कांग्रेस ने उन पर हमला करना शुरू किया, दावे किए गए कि रफ़ाल की फाइलें उनके बेडरूम में थीं. उन्होंने आरोपों से इनकार किया.
हालांकि रफ़ाल से जुड़े किसी भी ग़लत काम में पर्रिकर की संलिप्तता कभी साबित नहीं हुई है, लेकिन यह मामला उनके निधन के बाद भी जारी रहेगा.
Friday, March 15, 2019
क्या नेहरू ने यूएन की सुरक्षा परिषद में भारत के बदले चीन को सीट दे दी थी
चीन ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र से वैश्विक आतंकी घोषित नहीं होने दिया. संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में चीन स्थायी सदस्य है और उसने फ़्रांस के प्रस्ताव पर वीटो कर दिया.
चीन ने ऐसा चौथी बार किया है और भारत के लिए इसे बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है. भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में 14 फ़रवरी को जैश-ए-मोहम्मद ने सीआरपीएफ़ के एक काफ़िले पर आत्मघाती हमला कर 40 जवानों की जान ले ली थी.
इस हमले की ज़िम्मेदारी ख़ुद जैश ने ली थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि इस बार चीन मसूद अज़हर पर भारत के साथ खड़ा होगा.
भारत ने चीन के रुख़ पर दुःख जताया है तो मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसके लिए सरकार पर निशाना साधा है. राहुल ने ट्वीट कर कहा, ''कमज़ोर मोदी शी जिनपिंग से डरे हुए हैं. चीन ने भारत के ख़िलाफ़ क़दम उठाया तो मोदी के मुंह से एक शब्द नहीं निकला.'' राहुल गांधी की इस टिप्पणी पर बीजेपी ने कड़ी आपत्ति जताई है.
क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश मुश्किल में होता है तो राहुल गांधी को ख़ुशी क्यों होती है? रविशंकर प्रसाद ने कहा, ''चीन की बात राहुल करेंगे तो बात दूर तलक जाएगी.''
प्रसाद ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नौ जनवरी 2004 की 'द हिन्दू' की एक रिपोर्ट की कॉपी दिखाते हुए कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद की सीट लेने से इनकार कर दिया था और इसे चीन को दिलवा दिया था.
द हिन्दू की रिपोर्ट में कांग्रेस नेता और संयुक्त राष्ट्र में अवर महासचिव रहे शशि थरूर की किताब 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ़ इंडिया' का हवाला दिया गया है.
इस किताब में शशि थरूर ने लिखा है कि 1953 के आसपास भारत को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था लेकिन उन्होंने चीन को दे दिया. थरूर ने लिखा है कि भारतीय राजनयिकों ने वो फ़ाइल देखी थी जिस पर नेहरू के इनकार का ज़िक्र था. थरूर के अनुसार नेहरू ने यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी.
दरअसल, रविशंकर प्रसाद यह कहना चाह रहे थे कि आज अगर चीन यूएन की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य है तो नेहरू के कारण और उसी का ख़ामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है.
हलांकि कई लोग मानते हैं कि जो इस बात को लेकर नेहरू की आलोचना करते हैं वो कई अन्य तथ्यों की उपेक्षा करते हैं. संयुक्त राष्ट्र 1945 में बना था और इसे जुड़े संगठन तब आकार ही ले रहे थे.
1945 में सुरक्षा परिषद के जब सदस्य बनाए गए तब भारत आज़ाद भी नहीं हुआ था. 27 सितंबर, 1955 को नेहरू ने संसद में स्पष्ट रूप से इस बात को ख़ारिज कर दिया था कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का कोई अनौपचारिक प्रस्ताव मिला था.
27 सितंबर, 1955 को डॉ जेएन पारेख के सवालों के जवाब में नेहरू ने संसद में कहा था, ''यूएन में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने के लिए औपचारिक या अनौपचारिक रूप से कोई प्रस्ताव नहीं मिला था. कुछ संदिग्ध संदर्भों का हवाला दिया जा रहा है जिसमें कोई सच्चाई नहीं है. संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के तहत किया गया था और इसमें कुछ ख़ास देशों को स्थायी सदस्यता मिली थी. चार्टर में बिना संशोधन के कोई बदलाव या कोई नया सदस्य नहीं बन सकता है. ऐसे में कोई सवाल ही नहीं उठता है कि भारत को सीट दी गई और भारत ने लेने से इनकार कर दिया. हमारी घोषित नीति है कि संयुक्त राष्ट्र में सदस्य बनने के लिए जो भी देश योग्य हैं उन सबको शामिल किया जाए.''
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी जवाहरलाल नेहरू को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए चीन का समर्थन करने का गुनाहगार बताया है. जेटली का कहना है कि नेहरू ने भारत के बजाय चीन का समर्थन किया था. जेटली ने कहा है कि चीन और कश्मीर पर एक ही व्यक्ति ने बड़ी ग़लती की. अरुण जेटली ने ट्वीट कर दो अगस्त 1955 को नेहरू की तरफ़ से मुख्यमंत्रियों को लिखे चिट्ठी का हवाला दिया है.
जेटली ने अपने ट्वीट में लिखा है, ''दो अगस्त, 1955 को नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था. इस पत्र में नेहरू ने कहा था- अमरीका ने अनौपचारिक रूप से कहा है कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लेना चाहिए न कि सुरक्षा परिषद में. सुरक्षा परिषद में भारत को जगह मिलनी चाहिए. ज़ाहिर है हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते. चीन का सुरक्षा परिषद में नहीं होना उसके साथ नाइंसाफी होगी.''
क्या है इतिहास?
कहा जाता है कि 1950 के दशक में, भारत संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में चीन को शामिल किए जाने का एक बड़ा समर्थक था. तब यह सीट ताइवान के पास थी.
1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के उद्भव के बाद से, चीन का प्रतिनिधित्व च्यांग काई-शेक के रिपब्लिक ऑफ़ चाइना का शासन करता था, न कि माओं का पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना. संयुक्त राष्ट्र ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को यह सीट देने से इनकार कर दिया था.
चीन ने ऐसा चौथी बार किया है और भारत के लिए इसे बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है. भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में 14 फ़रवरी को जैश-ए-मोहम्मद ने सीआरपीएफ़ के एक काफ़िले पर आत्मघाती हमला कर 40 जवानों की जान ले ली थी.
इस हमले की ज़िम्मेदारी ख़ुद जैश ने ली थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि इस बार चीन मसूद अज़हर पर भारत के साथ खड़ा होगा.
भारत ने चीन के रुख़ पर दुःख जताया है तो मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसके लिए सरकार पर निशाना साधा है. राहुल ने ट्वीट कर कहा, ''कमज़ोर मोदी शी जिनपिंग से डरे हुए हैं. चीन ने भारत के ख़िलाफ़ क़दम उठाया तो मोदी के मुंह से एक शब्द नहीं निकला.'' राहुल गांधी की इस टिप्पणी पर बीजेपी ने कड़ी आपत्ति जताई है.
क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश मुश्किल में होता है तो राहुल गांधी को ख़ुशी क्यों होती है? रविशंकर प्रसाद ने कहा, ''चीन की बात राहुल करेंगे तो बात दूर तलक जाएगी.''
प्रसाद ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नौ जनवरी 2004 की 'द हिन्दू' की एक रिपोर्ट की कॉपी दिखाते हुए कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद की सीट लेने से इनकार कर दिया था और इसे चीन को दिलवा दिया था.
द हिन्दू की रिपोर्ट में कांग्रेस नेता और संयुक्त राष्ट्र में अवर महासचिव रहे शशि थरूर की किताब 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ़ इंडिया' का हवाला दिया गया है.
इस किताब में शशि थरूर ने लिखा है कि 1953 के आसपास भारत को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था लेकिन उन्होंने चीन को दे दिया. थरूर ने लिखा है कि भारतीय राजनयिकों ने वो फ़ाइल देखी थी जिस पर नेहरू के इनकार का ज़िक्र था. थरूर के अनुसार नेहरू ने यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी.
दरअसल, रविशंकर प्रसाद यह कहना चाह रहे थे कि आज अगर चीन यूएन की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य है तो नेहरू के कारण और उसी का ख़ामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है.
हलांकि कई लोग मानते हैं कि जो इस बात को लेकर नेहरू की आलोचना करते हैं वो कई अन्य तथ्यों की उपेक्षा करते हैं. संयुक्त राष्ट्र 1945 में बना था और इसे जुड़े संगठन तब आकार ही ले रहे थे.
1945 में सुरक्षा परिषद के जब सदस्य बनाए गए तब भारत आज़ाद भी नहीं हुआ था. 27 सितंबर, 1955 को नेहरू ने संसद में स्पष्ट रूप से इस बात को ख़ारिज कर दिया था कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का कोई अनौपचारिक प्रस्ताव मिला था.
27 सितंबर, 1955 को डॉ जेएन पारेख के सवालों के जवाब में नेहरू ने संसद में कहा था, ''यूएन में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने के लिए औपचारिक या अनौपचारिक रूप से कोई प्रस्ताव नहीं मिला था. कुछ संदिग्ध संदर्भों का हवाला दिया जा रहा है जिसमें कोई सच्चाई नहीं है. संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के तहत किया गया था और इसमें कुछ ख़ास देशों को स्थायी सदस्यता मिली थी. चार्टर में बिना संशोधन के कोई बदलाव या कोई नया सदस्य नहीं बन सकता है. ऐसे में कोई सवाल ही नहीं उठता है कि भारत को सीट दी गई और भारत ने लेने से इनकार कर दिया. हमारी घोषित नीति है कि संयुक्त राष्ट्र में सदस्य बनने के लिए जो भी देश योग्य हैं उन सबको शामिल किया जाए.''
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी जवाहरलाल नेहरू को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए चीन का समर्थन करने का गुनाहगार बताया है. जेटली का कहना है कि नेहरू ने भारत के बजाय चीन का समर्थन किया था. जेटली ने कहा है कि चीन और कश्मीर पर एक ही व्यक्ति ने बड़ी ग़लती की. अरुण जेटली ने ट्वीट कर दो अगस्त 1955 को नेहरू की तरफ़ से मुख्यमंत्रियों को लिखे चिट्ठी का हवाला दिया है.
जेटली ने अपने ट्वीट में लिखा है, ''दो अगस्त, 1955 को नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था. इस पत्र में नेहरू ने कहा था- अमरीका ने अनौपचारिक रूप से कहा है कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लेना चाहिए न कि सुरक्षा परिषद में. सुरक्षा परिषद में भारत को जगह मिलनी चाहिए. ज़ाहिर है हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते. चीन का सुरक्षा परिषद में नहीं होना उसके साथ नाइंसाफी होगी.''
क्या है इतिहास?
कहा जाता है कि 1950 के दशक में, भारत संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में चीन को शामिल किए जाने का एक बड़ा समर्थक था. तब यह सीट ताइवान के पास थी.
1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के उद्भव के बाद से, चीन का प्रतिनिधित्व च्यांग काई-शेक के रिपब्लिक ऑफ़ चाइना का शासन करता था, न कि माओं का पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना. संयुक्त राष्ट्र ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को यह सीट देने से इनकार कर दिया था.
Monday, March 11, 2019
लोकसभा चुनाव 2019: 11 अप्रैल से चुनाव, 23 मई को आएंगे नतीजे
2019 लोकसभा चुनाव सात चरणों में होंगे. इसकी घोषणा भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने की है.
11 अप्रैल को पहले चरण के लिए वोट डाले जाएंगे, जबकि 19 मई को सातवें चरण के लिए वोट डाले जाएंगे. मतों की गिनती 23 मई को होगी. लोकसभा के साथ ही ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और आंध्र प्रदेश विधानसभा के चुनाव भी होंगे.
सुनील अरोड़ा अपने दो सहयोगियों के साथ आम चुनाव की तिथियों को लेकर प्रेस कांफ्रेंस में चुनाव की तैयारियों को लेकर भी काफ़ी कुछ जानकारी दी.
हर पोलिंग बूथ पर इस्तेमाल होगा वीवीपैट
17वीं लोकसभा के गठन के लिए 90 करोड़ लोग वोट डालेंगे. 18 से 19 साल के डेढ़ करोड़ वोटर इस चुनाव में पहली बार हिस्सा लेंगे. मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक आठ करोड़ 43 लाख नए मतदाता इस बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे.
10 लाख पोलिंग बूथ पर वोट डाले जाएंगे. हर पोलिंग बूथ पर वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाएगा.
1950 टोल फ़्री नंबर पर वोटिंग लिस्ट से जुड़ी जानकारी ले सकेंगे.
कोई भी शख्स आचार संहिता के उल्लंधन की जानकारी एक एंड्रॉयड एप के जरिए दे सकता है. शिकायतकर्ता की पहचान उजागर नहीं की जाएगी. और इस पर जांच करक एक्शन लिया जाएगा.
इसके अलावा ईवीएम मशीन को जीपीएस के जरिए ट्रैक किया जाएगा.
वोटिंग के 48 घंटे पहले लाउडस्पीकर पर बैन. हर संवेदनशील स्थान पर सीआरपीएफ तैनात होगी.
चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के सोशल मीडिया प्रचार पर भी नज़र रखेगा. इसके साथ ही चुनाव आयुक्त ने बताया कि फेसबुक-गूगल ने भी चुनाव को देखते हुए कंटेट की खास निगरानी करने का हमें पूरा आश्वासन दिया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव तारीखों के ऐलान के बाद ट्वीट किया, ''मैं राजनीतिक पार्टी और सभी उम्मीदवारों को 2019 लोकसभा चुनाव के लिए शुभकामनाएं देता हूं. हम अलग-अलग पार्टियों से ताल्लुक रखते हैं लेकिन हमारा उद्देश्य भारत का विकास और उन्नति है. ''
पिछले यानी 2014 के लोकसभा चुनाव का ऐलान पाँच मार्च 2014 को किया गया था. मतदान 7 अप्रैल को शुरू होकर नौ चरणों में 12 मई को ख़त्म हुए थे. 16 मई को नतीजों में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत हासिल हुआ था और दूसरे सहयोगी दलों के साथ एनडीए की सरकार बनी. भाजपा को इन चुनाव में 282 सीटें मिली थीं.
लोकसभा में कितनी सीटें हैं?
संविधान के मुताबिक़ लोकसभा सीटों की अधिकतम संख्या 552 हो सकती है. फ़िलहाल लोकसभा सीटों की संख्या 545 है, जिनमें से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 543 सीटों के लिए आम चुनाव होते हैं. इनके अलावा अगर राष्ट्रपति को लगता है कि एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोगों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व काफ़ी नहीं है तो वह दो लोगों को नामांकित भी कर सकते हैं.
कुल सीटों में से 131 लोकसभा सीटें रिज़र्व होती हैं. इन 131 में अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें रिज़र्व हैं. यानी इन सीटों पर कोई अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं.
किसी भी पार्टी को बहुमत के लिए कम से कम 272 सीटें चाहिए होती हैं. अगर बहुमत से कुछ सीटें कम भी पड़ जाएं तो दूसरे दलों के साथ गठबंधन करके भी सरकार बनाई जा सकती है. राजनीतिक दलों का गठबंधन चुनाव से पहले भी हो सकता है और नतीजों के बाद भी. लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद लेने के लिए विपक्षी पार्टी के पास कम से कम कुल सीटों की 10 फ़ीसदी संख्या होनी चाहिए यानी 55 सीटें. 2014 के आम चुनाव में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को सिर्फ़ 44 सीटें ही मिल पाई थीं.
भाजपा ने 2014 में 282 सीटों के साथ बहुमत तो पाया था लेकिन फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के 268 सदस्य ही लोकसभा में रह गए हैं. कुछ सीटों को बीजेपी ने उपचुनाव में गंवा दिया. पार्टी के कुछ लोकसभा सदस्यों ने जैसे बीएस येदियुरप्पा और बी श्रीरामुल्लू ने विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए लोकसभा से इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन फिर भी गठबंधन वाले राजनीतिक दलों के सहयोग से बीजेपी की सरकार सुरक्षित है.
भारतीय चुनाव प्रक्रिया किस मॉडल पर आधारित है?
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था ब्रितानी वेस्टमिन्स्टर मॉडल पर आधारित है. ब्रिटेन में आम चुनाव के लिए एक ही दिन मतदान होता है, शाम होते-होते एग्ज़िट पोल आ जाते हैं और रातों-रात मतगणना करके अगली सुबह तक लोगों को चुनाव नतीजे भी मिल जाते हैं.
मगर भारत में ऐसा नहीं होता है. मतदान के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए इतने बड़े देश में कई चरणों में मतदान कराए जाते हैं. हर चरण के मतदान के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम को मतगणना तक सुरक्षित रखा जाता है.
चुनाव आयोग के निर्देशानुसार अब अंतिम चरण का मतदान समाप्त होने के बाद ही एग्ज़िट पोल प्रसारित हो सकते हैं. उसके भी कुछ दिन बाद मतगणना सुबह से शुरू होती है.
पहले जब मतपत्रों से चुनाव होते थे तब रुझान आने में शाम हो जाती थी और नतीजे साफ़ होते-होते काफ़ी वक़्त लगता था मगर अब ईवीएम के चलते दोपहर तक रुझान स्पष्ट हो जाते हैं और शाम तक नतीजे भी लगभग पता चल जाते हैं.
11 अप्रैल को पहले चरण के लिए वोट डाले जाएंगे, जबकि 19 मई को सातवें चरण के लिए वोट डाले जाएंगे. मतों की गिनती 23 मई को होगी. लोकसभा के साथ ही ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और आंध्र प्रदेश विधानसभा के चुनाव भी होंगे.
सुनील अरोड़ा अपने दो सहयोगियों के साथ आम चुनाव की तिथियों को लेकर प्रेस कांफ्रेंस में चुनाव की तैयारियों को लेकर भी काफ़ी कुछ जानकारी दी.
हर पोलिंग बूथ पर इस्तेमाल होगा वीवीपैट
17वीं लोकसभा के गठन के लिए 90 करोड़ लोग वोट डालेंगे. 18 से 19 साल के डेढ़ करोड़ वोटर इस चुनाव में पहली बार हिस्सा लेंगे. मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक आठ करोड़ 43 लाख नए मतदाता इस बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे.
10 लाख पोलिंग बूथ पर वोट डाले जाएंगे. हर पोलिंग बूथ पर वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाएगा.
1950 टोल फ़्री नंबर पर वोटिंग लिस्ट से जुड़ी जानकारी ले सकेंगे.
कोई भी शख्स आचार संहिता के उल्लंधन की जानकारी एक एंड्रॉयड एप के जरिए दे सकता है. शिकायतकर्ता की पहचान उजागर नहीं की जाएगी. और इस पर जांच करक एक्शन लिया जाएगा.
इसके अलावा ईवीएम मशीन को जीपीएस के जरिए ट्रैक किया जाएगा.
वोटिंग के 48 घंटे पहले लाउडस्पीकर पर बैन. हर संवेदनशील स्थान पर सीआरपीएफ तैनात होगी.
चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के सोशल मीडिया प्रचार पर भी नज़र रखेगा. इसके साथ ही चुनाव आयुक्त ने बताया कि फेसबुक-गूगल ने भी चुनाव को देखते हुए कंटेट की खास निगरानी करने का हमें पूरा आश्वासन दिया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव तारीखों के ऐलान के बाद ट्वीट किया, ''मैं राजनीतिक पार्टी और सभी उम्मीदवारों को 2019 लोकसभा चुनाव के लिए शुभकामनाएं देता हूं. हम अलग-अलग पार्टियों से ताल्लुक रखते हैं लेकिन हमारा उद्देश्य भारत का विकास और उन्नति है. ''
पिछले यानी 2014 के लोकसभा चुनाव का ऐलान पाँच मार्च 2014 को किया गया था. मतदान 7 अप्रैल को शुरू होकर नौ चरणों में 12 मई को ख़त्म हुए थे. 16 मई को नतीजों में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत हासिल हुआ था और दूसरे सहयोगी दलों के साथ एनडीए की सरकार बनी. भाजपा को इन चुनाव में 282 सीटें मिली थीं.
लोकसभा में कितनी सीटें हैं?
संविधान के मुताबिक़ लोकसभा सीटों की अधिकतम संख्या 552 हो सकती है. फ़िलहाल लोकसभा सीटों की संख्या 545 है, जिनमें से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 543 सीटों के लिए आम चुनाव होते हैं. इनके अलावा अगर राष्ट्रपति को लगता है कि एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोगों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व काफ़ी नहीं है तो वह दो लोगों को नामांकित भी कर सकते हैं.
कुल सीटों में से 131 लोकसभा सीटें रिज़र्व होती हैं. इन 131 में अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें रिज़र्व हैं. यानी इन सीटों पर कोई अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं.
किसी भी पार्टी को बहुमत के लिए कम से कम 272 सीटें चाहिए होती हैं. अगर बहुमत से कुछ सीटें कम भी पड़ जाएं तो दूसरे दलों के साथ गठबंधन करके भी सरकार बनाई जा सकती है. राजनीतिक दलों का गठबंधन चुनाव से पहले भी हो सकता है और नतीजों के बाद भी. लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद लेने के लिए विपक्षी पार्टी के पास कम से कम कुल सीटों की 10 फ़ीसदी संख्या होनी चाहिए यानी 55 सीटें. 2014 के आम चुनाव में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को सिर्फ़ 44 सीटें ही मिल पाई थीं.
भाजपा ने 2014 में 282 सीटों के साथ बहुमत तो पाया था लेकिन फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के 268 सदस्य ही लोकसभा में रह गए हैं. कुछ सीटों को बीजेपी ने उपचुनाव में गंवा दिया. पार्टी के कुछ लोकसभा सदस्यों ने जैसे बीएस येदियुरप्पा और बी श्रीरामुल्लू ने विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए लोकसभा से इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन फिर भी गठबंधन वाले राजनीतिक दलों के सहयोग से बीजेपी की सरकार सुरक्षित है.
भारतीय चुनाव प्रक्रिया किस मॉडल पर आधारित है?
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था ब्रितानी वेस्टमिन्स्टर मॉडल पर आधारित है. ब्रिटेन में आम चुनाव के लिए एक ही दिन मतदान होता है, शाम होते-होते एग्ज़िट पोल आ जाते हैं और रातों-रात मतगणना करके अगली सुबह तक लोगों को चुनाव नतीजे भी मिल जाते हैं.
मगर भारत में ऐसा नहीं होता है. मतदान के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए इतने बड़े देश में कई चरणों में मतदान कराए जाते हैं. हर चरण के मतदान के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम को मतगणना तक सुरक्षित रखा जाता है.
चुनाव आयोग के निर्देशानुसार अब अंतिम चरण का मतदान समाप्त होने के बाद ही एग्ज़िट पोल प्रसारित हो सकते हैं. उसके भी कुछ दिन बाद मतगणना सुबह से शुरू होती है.
पहले जब मतपत्रों से चुनाव होते थे तब रुझान आने में शाम हो जाती थी और नतीजे साफ़ होते-होते काफ़ी वक़्त लगता था मगर अब ईवीएम के चलते दोपहर तक रुझान स्पष्ट हो जाते हैं और शाम तक नतीजे भी लगभग पता चल जाते हैं.
Tuesday, March 5, 2019
जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध से कश्मीरी ख़फ़ा क्यों: ग्राउंड रिपोर्ट
ये जमात ऐ इस्लामी जम्मू-कश्मीर कौन-सी पार्टी है जिस पर लगी पाबंदी से पूरे कश्मीर में विरोध प्रकट किया जा रहा है.
उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़्ती जैसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हों या दो अलग विचारधारा के मालिक या फिर आधुनिक और पारंपरिक लोग, केंद्रीय सरकार द्वारा 28 फ़रवरी को पार्टी पर लगाए प्रतिबन्ध के सभी ख़िलाफ़ हैं.
श्रीनगर में जमात के पूर्व और वर्तमान के नेताओं से मिलने की कोशिश की, लेकिन कोई इसके लिए तैयार नहीं था. जमात से जुड़े एक स्थानीय युवा की कोशिशों से संस्था के महासचिव फ़हीम मोहम्मद रमज़ान से एक गुप्त स्थान पर मुलाक़ात हुई.
पार्टी की लीडरशिप में वो दूसरे स्थान पर हैं. इसके अध्यक्ष या अमीर, अब्दुल हमीद फ़ैयाज़, अपने दर्जनों साथियों के साथ इन दिनों जेल में हैं.
शायद गिरफ़्तारी से बचने के लिए फ़हीम मोहम्मद रमज़ान खुले आम बाहर नहीं निकलते. हमारी मुलाक़ात एक गुप्त जगह पर हुई.
बड़े से एक घर के एक छोटे और धीमी रौशनी वाले कमरे में वो अपने कुछ साथियों के साथ बैठे बातें कर रहे थे. घनी दाढ़ी और कश्मीरी टोपी पहने फहीम रमजान घबराये नहीं थे. उन्होंने इस प्रतिबन्ध को संविधान के ख़िलाफ़ बताया.
उन्होंने कहा, "हम अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे बाज़ाब्ता तौर पर. हम साबित करने की कोशिश करेंगे कि जमात ऐ इस्लामी पर लगे इल्ज़ामात बेबुनियाद हैं, इनकी कोई हक़ीक़त नहीं"
उनके अनुसार उनकी पार्टी सियासी ज़रूर है लेकिन साथ ही धार्मिक और सामजिक भी है जिसका काम समाज में भलाई करना और लोगों तक इस्लाम पहुँचाना है. इसके एक्टिव सदस्य 4,000 से अधिक नहीं होंगे लेकिन इनके हमदर्द लाखों में हैं जो इनकी विचारधारा को मानते हैं.
हमें उन्होंने अपनी संस्था पर लगी पाबंदी से उन हज़ारों लोगों को होने वाले नुकसान की बात बताई जो जमात के माहवारी वज़ीफ़े पर निर्भर करते हैं.
"हमारे बैतूल माल पर हज़ारों ग़रीब लोग निर्भर करते हैं. हमारे दर्जनों शिक्षण संस्थान हैं जहाँ बच्चे हमारे वज़ीफ़े के कारण अपनी पढ़ाई करते हैं. उनका क्या होगा?"
जमात ऐ इस्लामी जम्मू कश्मीर भारत की जमात ऐ इस्लामी हिन्द से अलग है. ये आरएसएस की तरह कैडर पर आधारित पार्टी है. आपातकालीन में आरएसएस के साथ जमात पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया था.
इसे भारत सरकार अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक बताती है. इसने अतीत में कई चुनाव लड़े हैं, लेकिन फहीम रमजान के मुताबिक़ उनकी पार्टी का चुनाव प्रणाली पर भरोसा उठा गया है.
पार्टी ने 2003 में चुनाव कभी न लड़ने का फैसला किया था, लेकिन कश्मीर में कई लोगों के विचार में पिछले विधान सभा चुनाव में जमात के कैडर की मदद से ही महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी ने जमात के गढ़ दक्षिण कश्मीर में कई सीटें जीती थीं.
जमात पर लगी पाबंदी के बाद इसके मुख्यालय में अब ताला लग लग गया है. इसके दर्जनों नेता हिरासत में. कुछ अंडरग्राउंड भी हैं. सरकार का दावा है कि जमात पर पाबंदी लगाने का उसका फ़ैसला सही है.
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने फोन पर बीबीसी को इसकी वजह ये बताई, "दुनिया भर में जमात ए इस्लामी जैसी संस्थाएं ही शिक्षा और लोगों की मदद करने जैसे काम की आड़ में टेररिज़्म की फंडिंग, उसको बढ़ाने और रेडिकलाइज़ेशन का काम करती हैं. यहाँ जमात बड़े पैमाने पर कट्टरता फैला रहा था अपने मदरसों में."
राज्य में जमात के स्कूलों का जाल बिछा है, इनमें धार्मिक पढ़ाई के इलावा आधुनिक शिक्षा देने का दावा किया जाता है.
शोपियां में जमात की विचारधारा वाले इस धार्मिक स्कूल में 650 बच्चे पढ़ते हैं. इस स्कूल को चलाने वाली सिराजुल उलूम एजुकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद यूसुफ़ मंटू कहते हैं उनके स्कूल में बच्चों को "नैतिक और धार्मिक शिक्षा के इलावा आधुनिक पढ़ाई भी दी जाती है."
मंटू ने बताया प्रशासन उनके स्कूल भी आया था लेकिन इसे सील नहीं किया. वो इस पाबन्दी पर खेद प्रकट करते हैं, "जमात ऐ इस्लामी जम्मू-कश्मीर को केंद्रीय सरकार शक की निगाह से देख रही है. ग्राउंड में ऐसा नज़र नहीं आ रहा है. मेरे ख्याल में ये अच्छी बात नहीं है उन्होंने इस पर पाबन्दी लगाई है. हिंदुस्तान के लिए, क़ौम के लिए, कश्मीर के लिए मेरे ख्याल में मुश्किलात में बढ़ावा कर दिया है."
जमात पर पहले भी पाबंदी लगाई जा चुकी है. साल 1975 और 1993 में. सवाल ये है कि क्या पार्टी पर पाबंदी से कट्टरता कम होगी? चरमपंथी हमले बंद होंगे?
नताशा राथर एक मानव अधिकार कैम्पेनर हैं, जिनका काम दूर दराज़ के इलाक़ों में आम लोगों से मिलना है.
वो कहती हैं, "अगर आप बोलना चाह रहे हैं कि जमात लोगों में अपनी विचारधारा पैदा कर रही है और हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ लोगों को खड़ा कर रही है तो यह ग़लत होगा. अगर जमात ए इस्लामी जैसे संगठन ना भी हों तो कश्मीर के लोगों में इतनी साझदारी आ चुकी है कि हम एक ऑक्यूपेशन में रह रहे हैं, और हमें इस ऑक्यूपेशन से लड़ना है ताकि हम एक समूह की हैसियत से जीवित रह सकें."
सरकार मानती है कि जमात की विचारधारा ख़त्म नहीं होगी. लेकिन जैसा कि राज्यपाल कहते हैं इसकी गतिविधियों में कमी आएगी, "मैं ये मानता हूँ कि इससे जमात ख़त्म नहीं होगी लेकिन इससे जमात की एक्टिविटी पर अंकुश लगेगा, इससे कट्टरता के फैलाव में रुकावट आएगी, इससे वो जिस तरह की एक्टिविटी कर रहे थे वो रुकेगी."
राज्य के बुद्धिजीवी भी इस प्रतिबन्ध के ख़िलाफ़ हैं. उनका कहना है कि इससे नतीजा उल्टा होगा. शैख़ शौकत हुसैन स्कूल ऑफ़ लीगल स्टडीज़ के अध्यक्ष हैं, "ये कॉंटेरप्रोडक्टिव होगा. इससे जमात की लोकप्रियता बढ़ेगी."
कश्मीर यूनिवर्सिटी में इंस्टिट्यूट ऑफ़ कश्मीर स्टडीज़ के इब्राहिम वाणी कहते हैं ये फ़ैसला लोकतंत्र के ख़िलाफ़ है. "इस पाबंदी से कश्मीर में सिकुड़ा हुआ सियासी स्पेस और भी सिकुड़ जाएगा."
कश्मीर के युवा भी भारत सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ नज़र आते हैं. श्रीनगर के लाल चौक पर खड़े एक युवा ने कहा, "उन्होंने जो जमात ऐ इस्लामी पर पाबंदी लगाई है उससे कोई फ़ायदा नहीं होगा, उससे समाज में तनाव और बढ़ेगी. एक और युवा ने कहा, "देखिए बैन करने से टेंस हालात और टेंस हो सकते हैं. तो इससे कुछ होने वाला तो है नहीं."
पाबंदी पांच साल के लिए हैं. नताशा आथर ने कहा कि अभी चुनाव आने वाले हैं. ये पाबंदी भारत में लोगों को खुश करने के लिए लगाई गई है.
उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़्ती जैसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हों या दो अलग विचारधारा के मालिक या फिर आधुनिक और पारंपरिक लोग, केंद्रीय सरकार द्वारा 28 फ़रवरी को पार्टी पर लगाए प्रतिबन्ध के सभी ख़िलाफ़ हैं.
श्रीनगर में जमात के पूर्व और वर्तमान के नेताओं से मिलने की कोशिश की, लेकिन कोई इसके लिए तैयार नहीं था. जमात से जुड़े एक स्थानीय युवा की कोशिशों से संस्था के महासचिव फ़हीम मोहम्मद रमज़ान से एक गुप्त स्थान पर मुलाक़ात हुई.
पार्टी की लीडरशिप में वो दूसरे स्थान पर हैं. इसके अध्यक्ष या अमीर, अब्दुल हमीद फ़ैयाज़, अपने दर्जनों साथियों के साथ इन दिनों जेल में हैं.
शायद गिरफ़्तारी से बचने के लिए फ़हीम मोहम्मद रमज़ान खुले आम बाहर नहीं निकलते. हमारी मुलाक़ात एक गुप्त जगह पर हुई.
बड़े से एक घर के एक छोटे और धीमी रौशनी वाले कमरे में वो अपने कुछ साथियों के साथ बैठे बातें कर रहे थे. घनी दाढ़ी और कश्मीरी टोपी पहने फहीम रमजान घबराये नहीं थे. उन्होंने इस प्रतिबन्ध को संविधान के ख़िलाफ़ बताया.
उन्होंने कहा, "हम अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे बाज़ाब्ता तौर पर. हम साबित करने की कोशिश करेंगे कि जमात ऐ इस्लामी पर लगे इल्ज़ामात बेबुनियाद हैं, इनकी कोई हक़ीक़त नहीं"
उनके अनुसार उनकी पार्टी सियासी ज़रूर है लेकिन साथ ही धार्मिक और सामजिक भी है जिसका काम समाज में भलाई करना और लोगों तक इस्लाम पहुँचाना है. इसके एक्टिव सदस्य 4,000 से अधिक नहीं होंगे लेकिन इनके हमदर्द लाखों में हैं जो इनकी विचारधारा को मानते हैं.
हमें उन्होंने अपनी संस्था पर लगी पाबंदी से उन हज़ारों लोगों को होने वाले नुकसान की बात बताई जो जमात के माहवारी वज़ीफ़े पर निर्भर करते हैं.
"हमारे बैतूल माल पर हज़ारों ग़रीब लोग निर्भर करते हैं. हमारे दर्जनों शिक्षण संस्थान हैं जहाँ बच्चे हमारे वज़ीफ़े के कारण अपनी पढ़ाई करते हैं. उनका क्या होगा?"
जमात ऐ इस्लामी जम्मू कश्मीर भारत की जमात ऐ इस्लामी हिन्द से अलग है. ये आरएसएस की तरह कैडर पर आधारित पार्टी है. आपातकालीन में आरएसएस के साथ जमात पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया था.
इसे भारत सरकार अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक बताती है. इसने अतीत में कई चुनाव लड़े हैं, लेकिन फहीम रमजान के मुताबिक़ उनकी पार्टी का चुनाव प्रणाली पर भरोसा उठा गया है.
पार्टी ने 2003 में चुनाव कभी न लड़ने का फैसला किया था, लेकिन कश्मीर में कई लोगों के विचार में पिछले विधान सभा चुनाव में जमात के कैडर की मदद से ही महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी ने जमात के गढ़ दक्षिण कश्मीर में कई सीटें जीती थीं.
जमात पर लगी पाबंदी के बाद इसके मुख्यालय में अब ताला लग लग गया है. इसके दर्जनों नेता हिरासत में. कुछ अंडरग्राउंड भी हैं. सरकार का दावा है कि जमात पर पाबंदी लगाने का उसका फ़ैसला सही है.
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने फोन पर बीबीसी को इसकी वजह ये बताई, "दुनिया भर में जमात ए इस्लामी जैसी संस्थाएं ही शिक्षा और लोगों की मदद करने जैसे काम की आड़ में टेररिज़्म की फंडिंग, उसको बढ़ाने और रेडिकलाइज़ेशन का काम करती हैं. यहाँ जमात बड़े पैमाने पर कट्टरता फैला रहा था अपने मदरसों में."
राज्य में जमात के स्कूलों का जाल बिछा है, इनमें धार्मिक पढ़ाई के इलावा आधुनिक शिक्षा देने का दावा किया जाता है.
शोपियां में जमात की विचारधारा वाले इस धार्मिक स्कूल में 650 बच्चे पढ़ते हैं. इस स्कूल को चलाने वाली सिराजुल उलूम एजुकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद यूसुफ़ मंटू कहते हैं उनके स्कूल में बच्चों को "नैतिक और धार्मिक शिक्षा के इलावा आधुनिक पढ़ाई भी दी जाती है."
मंटू ने बताया प्रशासन उनके स्कूल भी आया था लेकिन इसे सील नहीं किया. वो इस पाबन्दी पर खेद प्रकट करते हैं, "जमात ऐ इस्लामी जम्मू-कश्मीर को केंद्रीय सरकार शक की निगाह से देख रही है. ग्राउंड में ऐसा नज़र नहीं आ रहा है. मेरे ख्याल में ये अच्छी बात नहीं है उन्होंने इस पर पाबन्दी लगाई है. हिंदुस्तान के लिए, क़ौम के लिए, कश्मीर के लिए मेरे ख्याल में मुश्किलात में बढ़ावा कर दिया है."
जमात पर पहले भी पाबंदी लगाई जा चुकी है. साल 1975 और 1993 में. सवाल ये है कि क्या पार्टी पर पाबंदी से कट्टरता कम होगी? चरमपंथी हमले बंद होंगे?
नताशा राथर एक मानव अधिकार कैम्पेनर हैं, जिनका काम दूर दराज़ के इलाक़ों में आम लोगों से मिलना है.
वो कहती हैं, "अगर आप बोलना चाह रहे हैं कि जमात लोगों में अपनी विचारधारा पैदा कर रही है और हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ लोगों को खड़ा कर रही है तो यह ग़लत होगा. अगर जमात ए इस्लामी जैसे संगठन ना भी हों तो कश्मीर के लोगों में इतनी साझदारी आ चुकी है कि हम एक ऑक्यूपेशन में रह रहे हैं, और हमें इस ऑक्यूपेशन से लड़ना है ताकि हम एक समूह की हैसियत से जीवित रह सकें."
सरकार मानती है कि जमात की विचारधारा ख़त्म नहीं होगी. लेकिन जैसा कि राज्यपाल कहते हैं इसकी गतिविधियों में कमी आएगी, "मैं ये मानता हूँ कि इससे जमात ख़त्म नहीं होगी लेकिन इससे जमात की एक्टिविटी पर अंकुश लगेगा, इससे कट्टरता के फैलाव में रुकावट आएगी, इससे वो जिस तरह की एक्टिविटी कर रहे थे वो रुकेगी."
राज्य के बुद्धिजीवी भी इस प्रतिबन्ध के ख़िलाफ़ हैं. उनका कहना है कि इससे नतीजा उल्टा होगा. शैख़ शौकत हुसैन स्कूल ऑफ़ लीगल स्टडीज़ के अध्यक्ष हैं, "ये कॉंटेरप्रोडक्टिव होगा. इससे जमात की लोकप्रियता बढ़ेगी."
कश्मीर यूनिवर्सिटी में इंस्टिट्यूट ऑफ़ कश्मीर स्टडीज़ के इब्राहिम वाणी कहते हैं ये फ़ैसला लोकतंत्र के ख़िलाफ़ है. "इस पाबंदी से कश्मीर में सिकुड़ा हुआ सियासी स्पेस और भी सिकुड़ जाएगा."
कश्मीर के युवा भी भारत सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ नज़र आते हैं. श्रीनगर के लाल चौक पर खड़े एक युवा ने कहा, "उन्होंने जो जमात ऐ इस्लामी पर पाबंदी लगाई है उससे कोई फ़ायदा नहीं होगा, उससे समाज में तनाव और बढ़ेगी. एक और युवा ने कहा, "देखिए बैन करने से टेंस हालात और टेंस हो सकते हैं. तो इससे कुछ होने वाला तो है नहीं."
पाबंदी पांच साल के लिए हैं. नताशा आथर ने कहा कि अभी चुनाव आने वाले हैं. ये पाबंदी भारत में लोगों को खुश करने के लिए लगाई गई है.
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