दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इन दिनों आम चुनाव हो रहे हैं और भारतवासी इस बात का फ़ैसला कर रहे हैं कि अगले पांच साल किसकी सरकार देश को चलाएगी. चुनाव के इसी त्योहार में भ्रामक और ग़लत ख़बरों के प्रसार के मामले भी देखने को मिल रहे हैं.
जहां हर एक वोट की अपनी अहमियत होती है ऐसे में किसी ग़लत सूचना के आधार पर वोटों का भटकाव होने की गुंजाइश भी बढ़ जाती है, यही वजह है कि कई फ़ैक्ट चेक संस्थान और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर ग़लत सूचनाओं को जांचा-परखा जा रहा है.
ये तमाम बेहद शुरुआती क़दम हैं, यह साफ़ है कि झूठी सूचनाएं जितनी तेज़ी से फैलती हैं उनका कोई मुक़ाबला तक नहीं है.
चुनाव अभियान के दौरान ऐसी ही कई ग़लत और भ्रामक सूचनाओं का अंबार सा लग गया है. आइए, देखते हैं हाल में फैली ऐसी ही कुछ भ्रामक ख़बरें.
एक ख़बर बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि भारत की मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी की नेता और इटली में जन्मी सोनिया गांधी ब्रिटेन की महारानी से भी अमीर हैं.
यह एक ग़लत ख़बर है, जिसका खंडन छह साल पहले हो चुका था.
भारत जैसे देश में जहां आमदनी में असमानता का होना एक बहुत बड़ा मुद्दा है, वहां किसी बड़ी हस्ती या नेता के बारे में यह बताना कि उनके पास असीम निजी धन दौलत है, उस नेता की छवि को भारी नुक़सान पहंचा सकता है.
साल 2013 में हफ़िंगटन पोस्ट ने दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची प्रकाशित की थी जिसमें उन्होंने सोनिया गांधी का नाम भी शामिल किया था. हालांकि बाद में जब सोनिया गांधी ने इस सूची में अपना नाम शामिल करने पर सवाल उठाए तो उन्होंने उनका नाम हटा दिया था.
पिछले लोकसभा चुनाव यानी साल 2014 में सोनिया गांधी ने अपनी कुल संपत्ति नौ करोड़ रुपए बताई थी. जबकि ब्रिटेन की महारानी की संपत्ति इससे काफ़ी ज़्यादा है.
यह मामला भले ही पांच-छह साल पुराना हो लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव के दौरान इसे उठाया जा रहा है, यहां तक की सत्तारूढ़ दल बीजेपी के एक प्रवक्ता ने इस मामले को उठाया.
इतना ही नहीं, कई ख़बरों और पोस्ट में सोनिया गांधी को उनके रंग-रूप और उम्र से ज़्यादा ख़ूबसूरत दिखने पर भी सवाल किया गया. उनकी फ़र्जी तस्वीरें बनाकर उन्हें भारतीय नैतिक मूल्यों के ख़िलाफ़ बताया गया.
जबकि हक़ीक़त में वो तस्वीरें हॉलीवुड की एक मशहूर अदाकारा की थीं.
सोनिया गांधी क्या वाक़ई 'ब्रिटेन की महारानी से अमीर' हैं?
नरेंद्र मोदी अपने स्कूली दिनों में
एक और ख़बर जो बीते दिनों से सोशल मीडिया पर काफ़ी फैलाई गई वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी है.
गुजरात से आने वाले नरेंद्र मोदी एक चाय बेचने वाले के बेटे थे. उन्होंने अपनी चायवाले की छवि को बीते कई चुनावों में काफ़ी अच्छे से भुनाया है.
उन्होंने अपनी शैक्षणिक योग्यता में ख़ुद को पोस्ट-ग्रेजुएट बताया है.
इस बीच एक वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है जिसमें नरेंद्र मोदी को यह कहते हुए दिखाया जा रहा है कि उन्होंने हाईस्कूल (10वीं कक्षा) से आगे पढ़ाई नहीं की. इस वीडियो को कांग्रेस पार्टी के समर्थक काफ़ी शेयर कर रहे हैं.
असल में यह वीडियो काफ़ी पुराना है और शेयर किए जा रहे वीडियो में पूरे साक्षात्कार का छोटा सा अंश ही दिखाया जा रहा है. इसी वीडियो में नरेंद्र मोदी आगे बताते हैं कि उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से पूरी की है.
इस सच्चाई के बावजूद भी नरेंद्र मोदी की शिक्षा से जुड़ा वीडियो फ़ेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब पर काफ़ी तेज़ी से फैलाया जा रहा है.
वो 'सर्वे' जो कभी हुआ ही नहीं
सोशल मीडिया पर कई बार फ़र्जी सर्वे और ऐसे अवॉर्ड्स के बारे में बताया जाता है जो हक़ीक़त में कभी होते ही नहीं.
ऐसी ही एक झूठी ख़बर संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनेस्को के हवाले से फैलाई जा रही थी जिसमें बताया जा रहा था कि यूनेस्को ने नरेंद्र मोदी को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री घोषित किया है.
यह ख़बर पूरी तरह ग़लत है क्योंकि यूनेस्को कभी भी इस तरह के अवॉर्ड नहीं देता.
फिर भी यह ख़बर चुनावी प्रचार के दौरान काफी फैलाई जा रही है.
इसी तरह से बीबीसी के नाम पर भी कई फ़र्ज़ी सर्वे फैलाए जाते हैं जैसे बीबीसी के नाम से एक सर्वे के आधार पर यह बताया गया कि कांग्रेस पार्टी दुनिया की सबसे भ्रष्ट राजनीतिक पार्टी घोषित हुई है.
इसी तरह बीबीसी के नाम से एक और झूठी ख़बर फैलाई जा रही है जिसमें दावा किया जा रहा है कि बीबीसी ने चुनावों में बीजेपी की जीत बताई है.
वहीं बीबीसी के ही नाम से एक अन्य ख़बर में कांग्रेस के चुनाव में आगे रहने की बात भी फैलाई जा रही है.
बीबीसी ने इस तरह की ख़बरों पर साफ़ किया है कि उन्होंने भारत में चुनाव से जुड़ा ऐसा कोई सर्वे नहीं किया है.
नक़ली उंगलियां?
चुनावी अभियान के दौरान मतदान प्रक्रिया से जुड़ी कई झूठी जानकारियां भी फैलाई जा रहा हैं.
भारत में मतदान के दौरान मतदाता की उंगली पर नीले रंग की स्याही लगा दी जाती है, जिससे यह पहचान की जा सके कि उन्होंने अपना वोट डाल दिया है.
इसी तरह बीबीसी के नाम से एक और झूठी ख़बर फैलाई जा रही है जिसमें दावा किया जा रहा है कि बीबीसी ने चुनावों में बीजेपी की जीत बताई है.
वहीं बीबीसी के ही नाम से एक अन्य ख़बर में कांग्रेस के चुनाव में आगे रहने की बात भी फैलाई जा रही है.
बीबीसी ने इस तरह की ख़बरों पर साफ़ किया है कि उन्होंने भारत में चुनाव से जुड़ा ऐसा कोई सर्वे नहीं किया है.
नक़ली उंगलियां?
चुनावी अभियान के दौरान मतदान प्रक्रिया से जुड़ी कई झूठी जानकारियां भी फैलाई जा रहा हैं.
भारत में मतदान के दौरान मतदाता की उंगली पर नीले रंग की स्याही लगा दी जाती है, जिससे यह पहचान की जा सके कि उन्होंने अपना वोट डाल दिया है.
Friday, April 19, 2019
Monday, April 15, 2019
जलियांवाला और भगतसिंह पाकिस्तानी बच्चों को क्यूं नहीं पढ़ाए जातेः ब्लॉग
पाकिस्तान के सूचना मंत्री फ़व्वाद चौधरी ने 13 अप्रैल से एक दिन पहले अपने ट्विटर के ज़रिए ब्रिटेन से मांग की, कि वो जलियांवाला बाग़ नरसंहार पर माफ़ी मांगे. बंगाल में अंग्रेज़ों की ग़लत नीतियों के कारण भुखमरी से 1940 के दशक में जो लाखों लोग मारे गए, उस पर भी माफ़ी मांगे और अंग्रेज़ों ने लाहौर से जो कोहिनूर हीरा चुराया था, पाकिस्तान को वापस कर दें.
अब आप सौ प्रतिशत ये पूछेंगे कि भला जलियांवाला बाग़, बंगाल के अकाल और कोहिनूर हीरे की चोरी का आपसी संबंध क्या है, और एक ही ट्वीट में ये तीनों विषय निपटाने की ऐसी क्या जल्दी थी.
इस पर एक क़िस्सा सुनिए- एक साहब ने अपनी पत्नी के देहांत पर अपने ससुरजी को टेलीग्राम भेजा कि दौलतजहां का इंतक़ाल हो गया है, आप आएं तो अपने साथ पहलवान स्वीट्स की रेवड़ियों के दो डिब्बे भी लेते आएं.
उनके बेटे ने पूछा कि अब्बा ऐसे मौक़े पर नानाजी से रेवड़ियों की फ़रमाइश ज़रूरी थी क्या?
अब्बा ने कहा कि बेटे मैंने एक ही टेलीग्राम में दोनों बातें इसलिए लिख दी ताकि पैसे बचें, ख़ुद कमाओगे तब पता चलेगा.
तो यूं समझिए कि हमारे सूचना मंत्री ने वक़्त बचाने के लिए जलियांवाला बाग़, बंगाल की भुखमरी और कोहिनूर हीरे को एक ही ट्वीट में निपटा दिया.
अब अगर आप ये कहें कि 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ के शहीदों की याद में कोई डाक टिकट भी छपा, प्रधानमंत्री ने कोई पैग़ाम दिया, पाकिस्तानी झंडे को शोक में झुकाया गया, तो अर्ज़ ये है कि हमें और भी ज़रूरी काम करने हैं, ऐसी 'आलतू-फ़ालतू' बातों के लिए हमारे पास समय नहीं.
क्या इतना काफ़ी नहीं कि जलियांवाला नरसंहार की ख़बर 100 बरस पहले लाहौर पहुंची तो पूरे लाहौर में उसी दिन हंगामा हो गया. जिन्ना साहब ने रौलेट एक्ट के ख़िलाफ़ लेजिसलैटिव काउंसिल से इस्तीफ़ा देकर धुंआधार बयान दिए.
जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम के अगले ही दिन गुजरांवाला में ग़ुस्से में भरे हिंदुस्तानियों की भीड़ को भगाने के लिए ब्रिटिश इंडियन एयरफोर्स ने बमबारी भी की. पर हमें तो यह सब इतिहास में बताया ही नहीं गया. हमें तो ये समाचार भी कोई 15-20 साल पहले ही पता चला कि भगतसिंह पाकिस्तान में पैदा हुआ था और उसे फांसी भी यहीं दी गई.
अच्छा, हुआ होगा ऐसा, तो? पाकिस्तान में पैदा होने से कोई पाकिस्तानी थोड़े ही हो जाता है. मनमोहन सिंह भी पाकिस्तान में पैदा हुए थे. मेरे बचपन में जो स्कूली इतिहास पढ़ाया जाता था, उसमें गौतम बुद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, मंगल पांडे, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला भी पाकिस्तानी सभ्यता का हिस्सा थे.
मगर फिर एक दिन फ़ैसला हुआ कि पाकिस्तानी इतिहास मोहम्मद बिन क़ासिम से शुरू होगा और विभाजन से होता हुआ मोहम्मद ज़िया-उल-हक़ पर ख़त्म होगा, सारे हीरो मध्य एशिया और मध्य-पूर्व से आयातित होंगे.
ऐसे में बुल्ले शाह, वारिस शाह और दुल्ला भट्टी की जगह भी मुश्किल से निकलती है और आप फ़रमाइश कर रहे हैं कि जलियांवाला बाग़ और भगतसिंह पाकिस्तानी बच्चों को क्यूं नहीं पढ़ाए जाते.
रंजीत सिंह से भी बस थोड़ा-बहुत इसलिए संबंध है कि उनकी राजधानी लाहौर थी और कोहिनूर हीरा उनकी पगड़ी में चमक रहा था जिसे अंग्रेज़ छीनकर ले गए.
मालूम नहीं कि हमारे सूचना मंत्री को भी ये बात मालूम है कि नहीं कि पाकिस्तान इस घटना के 100 बरस बाद पैदा हुआ, या उन्हें बस कोहिनूर हीरा ही याद है. चलो कुछ तो याद है.
अब आप सौ प्रतिशत ये पूछेंगे कि भला जलियांवाला बाग़, बंगाल के अकाल और कोहिनूर हीरे की चोरी का आपसी संबंध क्या है, और एक ही ट्वीट में ये तीनों विषय निपटाने की ऐसी क्या जल्दी थी.
इस पर एक क़िस्सा सुनिए- एक साहब ने अपनी पत्नी के देहांत पर अपने ससुरजी को टेलीग्राम भेजा कि दौलतजहां का इंतक़ाल हो गया है, आप आएं तो अपने साथ पहलवान स्वीट्स की रेवड़ियों के दो डिब्बे भी लेते आएं.
उनके बेटे ने पूछा कि अब्बा ऐसे मौक़े पर नानाजी से रेवड़ियों की फ़रमाइश ज़रूरी थी क्या?
अब्बा ने कहा कि बेटे मैंने एक ही टेलीग्राम में दोनों बातें इसलिए लिख दी ताकि पैसे बचें, ख़ुद कमाओगे तब पता चलेगा.
तो यूं समझिए कि हमारे सूचना मंत्री ने वक़्त बचाने के लिए जलियांवाला बाग़, बंगाल की भुखमरी और कोहिनूर हीरे को एक ही ट्वीट में निपटा दिया.
अब अगर आप ये कहें कि 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ के शहीदों की याद में कोई डाक टिकट भी छपा, प्रधानमंत्री ने कोई पैग़ाम दिया, पाकिस्तानी झंडे को शोक में झुकाया गया, तो अर्ज़ ये है कि हमें और भी ज़रूरी काम करने हैं, ऐसी 'आलतू-फ़ालतू' बातों के लिए हमारे पास समय नहीं.
क्या इतना काफ़ी नहीं कि जलियांवाला नरसंहार की ख़बर 100 बरस पहले लाहौर पहुंची तो पूरे लाहौर में उसी दिन हंगामा हो गया. जिन्ना साहब ने रौलेट एक्ट के ख़िलाफ़ लेजिसलैटिव काउंसिल से इस्तीफ़ा देकर धुंआधार बयान दिए.
जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम के अगले ही दिन गुजरांवाला में ग़ुस्से में भरे हिंदुस्तानियों की भीड़ को भगाने के लिए ब्रिटिश इंडियन एयरफोर्स ने बमबारी भी की. पर हमें तो यह सब इतिहास में बताया ही नहीं गया. हमें तो ये समाचार भी कोई 15-20 साल पहले ही पता चला कि भगतसिंह पाकिस्तान में पैदा हुआ था और उसे फांसी भी यहीं दी गई.
अच्छा, हुआ होगा ऐसा, तो? पाकिस्तान में पैदा होने से कोई पाकिस्तानी थोड़े ही हो जाता है. मनमोहन सिंह भी पाकिस्तान में पैदा हुए थे. मेरे बचपन में जो स्कूली इतिहास पढ़ाया जाता था, उसमें गौतम बुद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, मंगल पांडे, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला भी पाकिस्तानी सभ्यता का हिस्सा थे.
मगर फिर एक दिन फ़ैसला हुआ कि पाकिस्तानी इतिहास मोहम्मद बिन क़ासिम से शुरू होगा और विभाजन से होता हुआ मोहम्मद ज़िया-उल-हक़ पर ख़त्म होगा, सारे हीरो मध्य एशिया और मध्य-पूर्व से आयातित होंगे.
ऐसे में बुल्ले शाह, वारिस शाह और दुल्ला भट्टी की जगह भी मुश्किल से निकलती है और आप फ़रमाइश कर रहे हैं कि जलियांवाला बाग़ और भगतसिंह पाकिस्तानी बच्चों को क्यूं नहीं पढ़ाए जाते.
रंजीत सिंह से भी बस थोड़ा-बहुत इसलिए संबंध है कि उनकी राजधानी लाहौर थी और कोहिनूर हीरा उनकी पगड़ी में चमक रहा था जिसे अंग्रेज़ छीनकर ले गए.
मालूम नहीं कि हमारे सूचना मंत्री को भी ये बात मालूम है कि नहीं कि पाकिस्तान इस घटना के 100 बरस बाद पैदा हुआ, या उन्हें बस कोहिनूर हीरा ही याद है. चलो कुछ तो याद है.
Monday, April 8, 2019
भारत: सिज़ेरियन डिलीवरी बढ़ने की क्या है वजह
41 साल की साक्षी अपने पहले बच्चे को जन्म देने वाली हैं. डॉक्टर ने उन्हें 10 अप्रैल की डिलीवरी डेट दी है. लेकिन वो चाहती हैं कि उनका बच्चा 13 तारीख को पैदा हो. ऐसा इसलिए क्योंकि एक पंडित ने उनके बच्चे के जन्म का मुहूर्त 13 तारीख का निकाला है.
साक्षी ने अपनी डॉक्टर को कह दिया है कि वो डिलीवरी मुहूर्त के हिसाब से ही करवाना चाहती हैं और वो इसके लिए सिज़ेरियन डिलीवरी कराने को तैयार हैं.
वहीं 28 साल की रोमा ने तो पक्का फैसला कर लिया है कि वो ऑपरेशन से ही डिलीवरी ही कराएंगी, क्योंकि वो नॉर्मल डिलीवरी के दर्द से नहीं गुज़रना चाहतीं.
स्री रोग विशेषज्ञ डॉ रेणु मलिक का कहना है कि आजकल साक्षी और रोमा जैसी कई महिलाएं हैं, जो नॉर्मल डिलीवरी के बजाए सिज़ेरियन डिलीवरी अपनी मर्ज़ी से कराती हैं. जबकि कई बार मेडिकली सिज़ेरियन की ज़रूरत ही नहीं होती.
जामा नेटवर्क ओपन की एक स्टडी में सामने आया है कि भारत में अमीर तबकों में ज़रूरत से ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरियां हो रही हैं, जबकि गरीब तबके में कई ज़रूरतमंदों को ऑपरेशन की सुविधा तक नहीं मिल पाती.
नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे -4 के मुताबिक पिछले दस साल में भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर दोगुनी हो गई है. एनएफएचएस - 4 के आंकड़ों के आधार पर जामा नेटवर्क ओपन ने एक स्टडी की है.
15 से 49 साल की करीब सात लाख युवतियों और महिलाओं पर ये स्टडी की गई है. इस स्टडी में पाया गया कि 2010 से 2016 तक भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर 17.2% थी. जबकि 1988 से 1993 तक भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर 2.9% ही थी.
इस अध्ययन में भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 640 ज़िलों की महिलाओं ने हिस्सा लिया था. स्टडी में पाया गया कि गर्भवती महिलाओं को नॉर्मल डिलीवरी होगी या सिज़ेरियन डिलीवरी ये इस बात पर भी निर्भर होता है कि महिला किस आर्थिक स्थिति कैसी है.
अमीर तबके में बहुत ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरी हो रही है, जबकि गरीब तबके की महिलाओं को सिज़ेरियन डिलीवरियां कम हो रही हैं. ये फासला 4.4% से लेकर 35.9% तक का हो सकता है.
भारत में सिज़ेरियन डिलीवरियां बढ़ने की कई वजहें हैं. डॉ रेणु मलिक कहती हैं, "कई महिलाएं दर्द सहन नहीं करना चाहती. कई डरती हैं. आजकल लोग सिर्फ़ एक या दो बच्चे चाहते हैं. इसलिए वो डिलीवरी में रिस्क नहीं लेना चाहतीं . कुछ लोग चाहते हैं कि बच्चे का जन्म किसी खास दिन या वक्त पर हो. बहुत से मेडिकल कारण भी होते हैं. आजकल शादियां लेट होती हैं. कई महिलाएं 30 की उम्र के बाद मां बन रही हैं. ऐसे में कॉम्पलिकेश बढ़ने का ख़तरा भी रहता है. हाइप टेंशन और डाइबिटीज़ जैसी बीमारियां आम हैं. लाइफस्टाइल एक बड़ा कारण है सिज़ेरियन डिलीवरी का. मोटापा बढ़ रहा है. महिलाएं एक्सरसाइज़ नहीं करतीं."
आम धारणा है कि अस्पतालों और डॉक्टरों पर भी आरोप लगते हैं कि वो पैसा बनाने के लिए और वक़्त बचाने के लिए नॉर्मल डिलीवरी के बजाए सिज़ेरियन डिलीवरी ज़्यादा करते हैं.
लेकिन डॉ रेणु मलिक इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखतीं. उनका कहना है कि कई जगह नार्मल डिलीवरी और सिज़ेरियन डिलीवरी की फीस लगभग एक जैसी कर दी गई है, ताकि लोगों को ये मंहगा ना लगे.
डॉ रेणु के मुताबिक, "नॉर्मल डिलीवरी में दर्द को कम करने के लिए एपिडुरियल एनस्थीसिया भी दिया जाने लगा है. इससे महिला को प्रसवपीड़ा तो होती है, लेकिन उसे पता नहीं चलता."
स्टडी के मुताबिक उत्तर भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों में अब भी 30% से ज़्यादा बच्चे घर पर पैदा होते हैं. वहीं दक्षिण भारत के सभी राज्यों और महाराष्ट्र, पंजाब जैसे आर्थिक रूप से बेहतर राज्यों में 90% से ज़्यादा बच्चे अस्पतालों में पैदा होते हैं.
स्टडी के मुताबिक राजस्थान, बिहार और झारखंड जैसे कम विकसित राज्यों में सिज़ेरियन डिलीवरी का रेट 10% से कम है. इनमें भी खासकर पहाड़ी इलाकों या जंगल वाले ज़िलों जैसे उत्तर पूर्व भारत, उत्तराखंड, दक्षिण छत्तीसगढ़ और दक्षिण पश्चिम ओडिशा शामिल हैं. वहीं दिल्ली और दक्षिण भारत के राज्य जैसे तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में सिज़ेरियन डिलीवरी का रेट 30% से 60% प्रतिशत तक है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सिज़ेरियन डिलीवरी की रेंज 10 से 15% तक रहनी चाहिए. लेकिन भारत में ये इससे ज़्यादा है.
दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहां सिज़ेरियन डिलीवरी के मामले बहुत ज़्यादा हैं. नेशनल सेंटर फॉर बॉयोटेक्नोलॉजी इंफोर्मेशन (एनसीबीआई) के 1990 से 2014 के आंकड़ों के मुताबिक लैटिन अमरीका और कैरिबियाई देशों में सबसे ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरी होती हैं. यहां इसका प्रतिशत 40.5% है.
सिज़ेरियन डिलीवरी की दर उत्तरी अमरीका में 32.3% है जबकि यूरोपीय देशों में ये दर 25% फीसदी है.
भारत के शहरी इलाकों में और मीडिल क्लास लोगों में सिज़ेरियन डिलीवरी ज़रूरत से ज़्यादा हो रही हैं. स्टडी के अंत में कहा गया है कि भारत में गैर ज़रूरी सिज़ेरियन डिलीवरी को रोकने के लिए महिलाओं और हेल्थ केयर प्रोफेशनलों को टारगेट करते हुए पॉलिसी बनाए जाने की ज़रूरत है.
साक्षी ने अपनी डॉक्टर को कह दिया है कि वो डिलीवरी मुहूर्त के हिसाब से ही करवाना चाहती हैं और वो इसके लिए सिज़ेरियन डिलीवरी कराने को तैयार हैं.
वहीं 28 साल की रोमा ने तो पक्का फैसला कर लिया है कि वो ऑपरेशन से ही डिलीवरी ही कराएंगी, क्योंकि वो नॉर्मल डिलीवरी के दर्द से नहीं गुज़रना चाहतीं.
स्री रोग विशेषज्ञ डॉ रेणु मलिक का कहना है कि आजकल साक्षी और रोमा जैसी कई महिलाएं हैं, जो नॉर्मल डिलीवरी के बजाए सिज़ेरियन डिलीवरी अपनी मर्ज़ी से कराती हैं. जबकि कई बार मेडिकली सिज़ेरियन की ज़रूरत ही नहीं होती.
जामा नेटवर्क ओपन की एक स्टडी में सामने आया है कि भारत में अमीर तबकों में ज़रूरत से ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरियां हो रही हैं, जबकि गरीब तबके में कई ज़रूरतमंदों को ऑपरेशन की सुविधा तक नहीं मिल पाती.
नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे -4 के मुताबिक पिछले दस साल में भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर दोगुनी हो गई है. एनएफएचएस - 4 के आंकड़ों के आधार पर जामा नेटवर्क ओपन ने एक स्टडी की है.
15 से 49 साल की करीब सात लाख युवतियों और महिलाओं पर ये स्टडी की गई है. इस स्टडी में पाया गया कि 2010 से 2016 तक भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर 17.2% थी. जबकि 1988 से 1993 तक भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर 2.9% ही थी.
इस अध्ययन में भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 640 ज़िलों की महिलाओं ने हिस्सा लिया था. स्टडी में पाया गया कि गर्भवती महिलाओं को नॉर्मल डिलीवरी होगी या सिज़ेरियन डिलीवरी ये इस बात पर भी निर्भर होता है कि महिला किस आर्थिक स्थिति कैसी है.
अमीर तबके में बहुत ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरी हो रही है, जबकि गरीब तबके की महिलाओं को सिज़ेरियन डिलीवरियां कम हो रही हैं. ये फासला 4.4% से लेकर 35.9% तक का हो सकता है.
भारत में सिज़ेरियन डिलीवरियां बढ़ने की कई वजहें हैं. डॉ रेणु मलिक कहती हैं, "कई महिलाएं दर्द सहन नहीं करना चाहती. कई डरती हैं. आजकल लोग सिर्फ़ एक या दो बच्चे चाहते हैं. इसलिए वो डिलीवरी में रिस्क नहीं लेना चाहतीं . कुछ लोग चाहते हैं कि बच्चे का जन्म किसी खास दिन या वक्त पर हो. बहुत से मेडिकल कारण भी होते हैं. आजकल शादियां लेट होती हैं. कई महिलाएं 30 की उम्र के बाद मां बन रही हैं. ऐसे में कॉम्पलिकेश बढ़ने का ख़तरा भी रहता है. हाइप टेंशन और डाइबिटीज़ जैसी बीमारियां आम हैं. लाइफस्टाइल एक बड़ा कारण है सिज़ेरियन डिलीवरी का. मोटापा बढ़ रहा है. महिलाएं एक्सरसाइज़ नहीं करतीं."
आम धारणा है कि अस्पतालों और डॉक्टरों पर भी आरोप लगते हैं कि वो पैसा बनाने के लिए और वक़्त बचाने के लिए नॉर्मल डिलीवरी के बजाए सिज़ेरियन डिलीवरी ज़्यादा करते हैं.
लेकिन डॉ रेणु मलिक इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखतीं. उनका कहना है कि कई जगह नार्मल डिलीवरी और सिज़ेरियन डिलीवरी की फीस लगभग एक जैसी कर दी गई है, ताकि लोगों को ये मंहगा ना लगे.
डॉ रेणु के मुताबिक, "नॉर्मल डिलीवरी में दर्द को कम करने के लिए एपिडुरियल एनस्थीसिया भी दिया जाने लगा है. इससे महिला को प्रसवपीड़ा तो होती है, लेकिन उसे पता नहीं चलता."
स्टडी के मुताबिक उत्तर भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों में अब भी 30% से ज़्यादा बच्चे घर पर पैदा होते हैं. वहीं दक्षिण भारत के सभी राज्यों और महाराष्ट्र, पंजाब जैसे आर्थिक रूप से बेहतर राज्यों में 90% से ज़्यादा बच्चे अस्पतालों में पैदा होते हैं.
स्टडी के मुताबिक राजस्थान, बिहार और झारखंड जैसे कम विकसित राज्यों में सिज़ेरियन डिलीवरी का रेट 10% से कम है. इनमें भी खासकर पहाड़ी इलाकों या जंगल वाले ज़िलों जैसे उत्तर पूर्व भारत, उत्तराखंड, दक्षिण छत्तीसगढ़ और दक्षिण पश्चिम ओडिशा शामिल हैं. वहीं दिल्ली और दक्षिण भारत के राज्य जैसे तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में सिज़ेरियन डिलीवरी का रेट 30% से 60% प्रतिशत तक है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सिज़ेरियन डिलीवरी की रेंज 10 से 15% तक रहनी चाहिए. लेकिन भारत में ये इससे ज़्यादा है.
दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहां सिज़ेरियन डिलीवरी के मामले बहुत ज़्यादा हैं. नेशनल सेंटर फॉर बॉयोटेक्नोलॉजी इंफोर्मेशन (एनसीबीआई) के 1990 से 2014 के आंकड़ों के मुताबिक लैटिन अमरीका और कैरिबियाई देशों में सबसे ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरी होती हैं. यहां इसका प्रतिशत 40.5% है.
सिज़ेरियन डिलीवरी की दर उत्तरी अमरीका में 32.3% है जबकि यूरोपीय देशों में ये दर 25% फीसदी है.
भारत के शहरी इलाकों में और मीडिल क्लास लोगों में सिज़ेरियन डिलीवरी ज़रूरत से ज़्यादा हो रही हैं. स्टडी के अंत में कहा गया है कि भारत में गैर ज़रूरी सिज़ेरियन डिलीवरी को रोकने के लिए महिलाओं और हेल्थ केयर प्रोफेशनलों को टारगेट करते हुए पॉलिसी बनाए जाने की ज़रूरत है.
Thursday, April 4, 2019
अमित शाह किस खेल में कभी नहीं हारते
"मुझे वो दिन याद है जब मैं एक युवा कार्यकर्ता के रूप में नारनपुरा इलाक़े में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के लिए पोस्टर चिपकाता था. वर्षों बीत गए हैं और मैं बहुत बड़ा हो गया हूं लेकिन यादें अभी भी ताजा हैं और मुझे पता है कि मेरी यात्रा यहीं से शुरू हुई थी."
30 मार्च को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपना नामांकन पत्र दाखिल करने से पहले आयोजित रोड शो में ये बातें कही थीं.
गुजरात की गांधीनगर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे शाह उस समय की बात कर रहे थे जब 1982 में वो एबीवीपी के युवा कार्यकर्ता थे.
कई साल बीत चुके हैं और वो लड़का जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा के दूसरे दिग्गज नेताओं के लिए पोस्टर चिपकाता था, आज खुद पार्टी का पोस्टर ब्यॉय बन चुका है.
अमित शाह की अब तक की यात्रा नाटकीय घटनाक्रम से भरी रही है. इसकी तुलना किसी बॉलीवुड फ़िल्म के नायक के जीवन से की जा सकती है.
शाह ने अपने जीवन में हर तरह के अच्छे-बुरे वक़्त देखे हैं. एबीवीपी कार्यकर्ता के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत करने वाले शाह आज उस मुकाम तक पहुंच गए हैं, जहां वो पार्टी के प्रदर्शन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं, चाहे पार्टी चुनाव जीते या हारे.
शाह का जन्म 22 अक्तूबर 1964 को मुंबई के एक बनिया परिवार में हुआ था. 14 वर्ष की छोटी आयु में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए थे और यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत समझी जाती है.
गांधीनगर के एक छोटे से शहर मनसा में उन्होंने यह शुरुआत 'तरुण स्वयंसेवक' के रूप में की थी. यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था.
बाद में अमित शाह अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिए अहमदाबाद आए, जहां उन्होंने एबीवीपी की सदस्यता ली. साल 1982 में बायो-केमेस्ट्री के छात्र के रूप में अमित शाह को अहमदाबाद में छात्र संगठन एबीवीपी के सचिव की जिम्मेदारी दी गई.
बाद में उन्हें भाजपा की अहमदाबाद इकाई का सचिव बनाया गया. तब से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने पार्टी में प्रदेश इकाई के कई महत्वपूर्ण पदों को संभाला.
1997 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाए जाने के बाद उन्हें भाजपा प्रदेश इकाई के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई.
हालांकि पदोन्नति का ये सिलसिला कुछ वक़्त के लिए तब थम गया जब उन्हें सोहराबुद्दीन और कौसर बी के फर्जी मुठभेड़ मामले में जेल जाना पड़ा.
राजनीतिक के पंडित इसे उनकी यात्रा का अंतिम पड़ाव मान रहे थे, लेकिन अमित शाह ने विरोधी लहरों के बीच से एक दमदार गोता लगाया और राजनीति में जबरदस्त वापसी की.
जेल से रिहा होने के बाद वो पार्टी के लिए कड़ी मेहनत करने लगे और तेज़ी से तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए.
अमित शाह को करीब से जानने वालों का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे दमखम के साथ गांधीनगर सीट पर काम करना शुरू किया और इससे अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेताओं को फायदा पहुंचाया.
राजनीति पर नजर रखने वालों और पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि वाजपेयी और आडवाणी की ही तरह उन्होंने नरेंद्र मोदी को राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर लाने में मदद की.
दोनों नेताओं के करीब रहने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "उनका कहना है कि मोदी और शाह एक ऐसे बल्लेबाज़ों की जोड़ी है जो एक साथ कई शतक बनाती है."
"मोदी और शाह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. वो दशकों से एक साथ रहे हैं. वो एक जैसा सोचते हैं. वो एक परफेक्ट टीम की तरह काम करते हैं."
"वे जीवन और राजनीतिक जीवन के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हुए दिख सकते हैं, लेकिन वे दोनों एक दूसरे को पूरा करते हैं."
"शाह एक ऐसे बल्लेबाज़ हैं जो अपने बल्लेबाज़ साथी का साथ देते हैं और उन्हें ज्यादा से ज्यादा सेंचुरी स्कोर करने में मदद करते हैं."
"वो एक ऐसे बल्लेबाज़ हैं जो अपने निजी स्कोर की चिंता नहीं करते हुए अपनी टीम के लिए धमाकेदार जीत सुनिश्चित करते हैं."
2014 की जीत के लिए मोदी उन्हें "मैन ऑफ द मैच" का खिताब देते हैं.
वरिष्ठ नेता ने आगे कहा कि शाह एक फ़िल्म निर्देशक की तरह हैं जो कैमरे के पीछे काम करते हैं और अभिनेताओं को स्टार बनाते हैं. शाह ने कई पॉलिटिकल स्टार बनाए हैं लेकिन सुपर स्टार नरेंद्र मोदी रहे हैं.
राजनीतिक पर नजर रखने वालों का कहना है कि शाह एक बेहतरीन मैनेजर हैं. उनका अनुशासन सेना की तरह है जो भाजपा कार्यकर्ताओं में देखने को मिलता है.
वो अपने कैडर को खुद अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं. वो दशकों से बूथ मैनेजमेंट पर जोर दे रहे हैं, जिसका परिणाम पहले गुजरात और फिर 2014 के लोकसभा चुनावों में देखने को मिला है.
उनकी रणनीति और प्रशासनिक कुशलता की वजह से पार्टी ने उन्हें साल 2010 में महासचिव का पद दिया और उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा.
शाह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा के चुनावी भाग्य को बदल दिया और पार्टी ने शानदार जीत हासिल की. 80 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में पार्टी ने 73 पर बाजी मारी.
उनके प्रभारी रहते हुए महज दो साल में पार्टी का वोट शेयर राज्य में करीब ढाई गुणा बढ़ गया. 2014 के चुनावों में शाह भाजपा के चुनावी कमेटी के सदस्य थे और उन्होंने जनसंपर्क, बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचने और नए वोटरों को जोड़ने को जिम्मेदारी दी गई थी.
30 मार्च को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपना नामांकन पत्र दाखिल करने से पहले आयोजित रोड शो में ये बातें कही थीं.
गुजरात की गांधीनगर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे शाह उस समय की बात कर रहे थे जब 1982 में वो एबीवीपी के युवा कार्यकर्ता थे.
कई साल बीत चुके हैं और वो लड़का जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा के दूसरे दिग्गज नेताओं के लिए पोस्टर चिपकाता था, आज खुद पार्टी का पोस्टर ब्यॉय बन चुका है.
अमित शाह की अब तक की यात्रा नाटकीय घटनाक्रम से भरी रही है. इसकी तुलना किसी बॉलीवुड फ़िल्म के नायक के जीवन से की जा सकती है.
शाह ने अपने जीवन में हर तरह के अच्छे-बुरे वक़्त देखे हैं. एबीवीपी कार्यकर्ता के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत करने वाले शाह आज उस मुकाम तक पहुंच गए हैं, जहां वो पार्टी के प्रदर्शन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं, चाहे पार्टी चुनाव जीते या हारे.
शाह का जन्म 22 अक्तूबर 1964 को मुंबई के एक बनिया परिवार में हुआ था. 14 वर्ष की छोटी आयु में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए थे और यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत समझी जाती है.
गांधीनगर के एक छोटे से शहर मनसा में उन्होंने यह शुरुआत 'तरुण स्वयंसेवक' के रूप में की थी. यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था.
बाद में अमित शाह अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिए अहमदाबाद आए, जहां उन्होंने एबीवीपी की सदस्यता ली. साल 1982 में बायो-केमेस्ट्री के छात्र के रूप में अमित शाह को अहमदाबाद में छात्र संगठन एबीवीपी के सचिव की जिम्मेदारी दी गई.
बाद में उन्हें भाजपा की अहमदाबाद इकाई का सचिव बनाया गया. तब से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने पार्टी में प्रदेश इकाई के कई महत्वपूर्ण पदों को संभाला.
1997 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाए जाने के बाद उन्हें भाजपा प्रदेश इकाई के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई.
हालांकि पदोन्नति का ये सिलसिला कुछ वक़्त के लिए तब थम गया जब उन्हें सोहराबुद्दीन और कौसर बी के फर्जी मुठभेड़ मामले में जेल जाना पड़ा.
राजनीतिक के पंडित इसे उनकी यात्रा का अंतिम पड़ाव मान रहे थे, लेकिन अमित शाह ने विरोधी लहरों के बीच से एक दमदार गोता लगाया और राजनीति में जबरदस्त वापसी की.
जेल से रिहा होने के बाद वो पार्टी के लिए कड़ी मेहनत करने लगे और तेज़ी से तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए.
अमित शाह को करीब से जानने वालों का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे दमखम के साथ गांधीनगर सीट पर काम करना शुरू किया और इससे अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेताओं को फायदा पहुंचाया.
राजनीति पर नजर रखने वालों और पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि वाजपेयी और आडवाणी की ही तरह उन्होंने नरेंद्र मोदी को राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर लाने में मदद की.
दोनों नेताओं के करीब रहने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "उनका कहना है कि मोदी और शाह एक ऐसे बल्लेबाज़ों की जोड़ी है जो एक साथ कई शतक बनाती है."
"मोदी और शाह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. वो दशकों से एक साथ रहे हैं. वो एक जैसा सोचते हैं. वो एक परफेक्ट टीम की तरह काम करते हैं."
"वे जीवन और राजनीतिक जीवन के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हुए दिख सकते हैं, लेकिन वे दोनों एक दूसरे को पूरा करते हैं."
"शाह एक ऐसे बल्लेबाज़ हैं जो अपने बल्लेबाज़ साथी का साथ देते हैं और उन्हें ज्यादा से ज्यादा सेंचुरी स्कोर करने में मदद करते हैं."
"वो एक ऐसे बल्लेबाज़ हैं जो अपने निजी स्कोर की चिंता नहीं करते हुए अपनी टीम के लिए धमाकेदार जीत सुनिश्चित करते हैं."
2014 की जीत के लिए मोदी उन्हें "मैन ऑफ द मैच" का खिताब देते हैं.
वरिष्ठ नेता ने आगे कहा कि शाह एक फ़िल्म निर्देशक की तरह हैं जो कैमरे के पीछे काम करते हैं और अभिनेताओं को स्टार बनाते हैं. शाह ने कई पॉलिटिकल स्टार बनाए हैं लेकिन सुपर स्टार नरेंद्र मोदी रहे हैं.
राजनीतिक पर नजर रखने वालों का कहना है कि शाह एक बेहतरीन मैनेजर हैं. उनका अनुशासन सेना की तरह है जो भाजपा कार्यकर्ताओं में देखने को मिलता है.
वो अपने कैडर को खुद अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं. वो दशकों से बूथ मैनेजमेंट पर जोर दे रहे हैं, जिसका परिणाम पहले गुजरात और फिर 2014 के लोकसभा चुनावों में देखने को मिला है.
उनकी रणनीति और प्रशासनिक कुशलता की वजह से पार्टी ने उन्हें साल 2010 में महासचिव का पद दिया और उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा.
शाह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा के चुनावी भाग्य को बदल दिया और पार्टी ने शानदार जीत हासिल की. 80 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में पार्टी ने 73 पर बाजी मारी.
उनके प्रभारी रहते हुए महज दो साल में पार्टी का वोट शेयर राज्य में करीब ढाई गुणा बढ़ गया. 2014 के चुनावों में शाह भाजपा के चुनावी कमेटी के सदस्य थे और उन्होंने जनसंपर्क, बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचने और नए वोटरों को जोड़ने को जिम्मेदारी दी गई थी.
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